मजाज़ बने फिरते हो

लोग न जाने 
क्यों 
लफ्जों को तोड़ मरोड़ के 
शायरी करते रहते हैं 
अरे मोहब्बत तुमको होती है 
कहर बरपा हर्फ 
दर हर्फ करते हो 
रूबरू जब होते हो
तुम्हे अपनी कहनी न कहनी 
तो आती नहीं 
अकेले में कोना थाम के 
कभी मजनू 
तो 
कभी देवदास बने 
पब्लिक की हमदर्दी 
बटोरते फिरते हो 
उस चक्कर में 
मोहल्ले भर की भाभियों 
की नजरों में भाइयों का 
जीना मोहाल करते हो 
तुम्हारी ये बेजा हरकतें 
जिनको तुम मोहब्बत के नाम 
पर परोसते फिरते हो 
ये मोहल्ले की जनानियों में 
जब से उसका डोला उठा है 
तुम वो आएगी 
वो आएगी कहते 
अमीनाबाद में फिरते हो
तुम्हारी इन्हीं हरकतों से 
मजाज़ का तमाशा हो गया 
न जाने क्यों तुम लोग 
मोहब्बत में फना होकर 
लफ्जों का जनाज़ा 
निकालते फिरते हो 
न खुद चैन से रहते हो 
न लफ्जों को चैन देते हो
लफ्ज़ मजाज़ सब गुम हो गये 

तरुण कुमार 
लखनऊ 
21/02/25
दोपहर 12:20

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