हसरतों भरी निगाहें

वो उन्हीं 
हसरतों भरी 
निगाहों से 
देखती 
मेरे सामने से 
गुज़र गई 
कोई साथ था 
जिसके साथ 
मजबूर सी 
चली गई 
बस वो मुझे यूं 
न देखती 
मुझे शुकून 
रहता
ये क्या 
ही हो गया 
यूं पल भर 
की निगाहे 
ज़बान में 
वो जो 
तब न उजड़ा 
आज उजड़ कर 
बिखर गया 

तरुण कुमार 
लखनऊ 
18/02/25
11:04 रात्रि

Comments

Popular posts from this blog

मुझे तो बिटिया चाहिए

रूदाद

मज़दूर दिवस