रूदाद

अपनी रूदाद ज़माने को सुनाते क्यों हो 
ग़ैर के सामने औकात गिराते क्यों हो
ग़म उठने का अगर ताब नहीं है तुममें 
अपनी पलकों पर हंसी ख्वाब सजाते क्यों हो
ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं टूटेंगे तो बिखर जायेंगे 
रेत के ढेर पर दीवार उठाते क्यों हो। 
तरुण कुमार शुक्ल 

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