इस ज़हर बुझे से वक़्त में

इस ज़हर बुझे से 
वक्त में 
आओ कोई 
ख़ूबसूरत सा साज़ उठाये 
कुछ रंग 
ख़ुशनुमा से बिखेर दें 
जगमगा दें कुछ रोशनी 
ना उम्मीद भरे माहौल में 
कुछ गीत मोहब्बत से
लबरेज गाये जायें
सुलगते अंगारों से 
आओ कुछ 
उजड़े घरों में 
किसी तट से
हट कर
दीप जलाये 
आ रही हैं 
आवाजें उस बदलाव 
नई कोपलों से
बदलते हालात 
की सूरत गढ़ी
कुछ जायेगी

जब मैं अकेला होता हूँ 
दूसरा कोई नहीं होता
खुद से ही बाते करता हूं 
हंसता हूं मुस्काता हूं 
फिर आंसू बहते रहते हैं 
बस बात इतनी सी है 
समझाऊं तो क्या 
समझाऊं
कुछ कहते 
मैं बावरा हो रहा हूँ

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