कहनी न कहनी
तुमसे कहनी
न कहनी
सब तो कह डाली
अब किस से कहते
कहनी तो बहुत सी बातें हैं
कभी तुम नहीं होती
कभी हम नहीं होते
रह जाती हैं
दिल की बातें
दिल में ही
घूमती फिरती
रहती हैं
रगों में
कभी दिल में
कभी दिमाग में
जुबां पर आती तो हैं
अल्फाजों से टकराती भी हैं
आवाज़ में तब्दील नहीं होती
जो तब्दील होती हैं
वो माकूल नहीं होती
लफ्ज़ उनको
हु बहू
संवार ने की
क़ूबत नहीं पैदा
कर पाते
तरुण कुमार
27/10/24
11:40रात्रि
लखनऊ
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