तुम खिल उठती थी

जब तुमको 
पहले कभी 
छूते थे
तुम खिल उठती थी 
चहक सी जाती 
जैसे अर्से से 
इंतजार सा था
था तो था
होता भी है
होना भी 
चाहिये भी
वही सब 
आखिर 
कब तक 
हद्द है
न हो तो भी
मुसीबत 
हो तो 
ज़माने की 
अंधी दीवारों का 
ये खौफ आखिर 
ये बला क्या 
है 
अब है भी तो क्या 
अपनी ख्वाहिशों 
का दम किसकी 
खातिर 
मैं फ़ना कर दूं

तरूण कुमार 
लखनऊ 
20/02/25
13:31 दोपहर

Comments

Popular posts from this blog

मुझे तो बिटिया चाहिए

रूदाद

मज़दूर दिवस