ये कैसा बागबां यारों
ये कैसा बागबां है यारों
यहां हर शाख पर कुछ राख सा क्या है
हर गुल और बूटा-बूटा परेशान सा क्यों है
ये दरख़्त ये पौधे सब खामोश से क्यों हैं
कोई हवा कोई पानी कोई माली
कोई पासबाँ भी नज़र नहीं आता
ये कैसा ख़ौफ़ पसरा है इसकी फिज़ा में
इसे तुम बाग कहते हो
कोई चिड़िया कोई कबूतर कोई पक्षी
यहां बसेरा क्यों नहीं करता
न कोई सोता पानी का
न खाने को कुछ मयस्सर
कैसा है ये बाग कहने को
सांकलों में बांध कर जिसे गुज़रे
वहीं मंसूर था ज़माने का
बहारों से न जाने
किसको इतना खौफ था
चमन की खुशबू लूट ली उसने
बेइल्म का सितम सिर्फ खौफ देता है
उसकी लाठी का इल्म से क्या लेना
तरुण कुमार
३१/१२/२०२४
१०:५२ रात्रि
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