फर्क तब में और अब में
फर्क तब में
और अब में
हमने तुम्हे खोजना
छोड़ दिया है
ये समझना
वो समझना
या
ये समझाना
वो समझाना
ऐसा भी नहीं
की तुम्हे भुला रहा हूं
या मेरी याददाश्त जा रही है
बस बात बात में
लड़ना झगड़ना
उलाहने देना
आते जाते
फब्तियां कसना
इसका उसका
हुस्का लगाना
छोड़ दिया है
ये न सोच लेना
की मैं कुछ बूढ़ा हो चला हूं
कमज़ोर हो चुका हूं
ये सारी बातें
तब की थीं
जब हम राहें सफर में थे
अब यूं समझ लो
इश्क परवान चढ़ चुका है
अब उन सारे पेचों खम
से निकल कर
उन तूफानी लहरों को पार कर
हौले से जब चली है
तो अब मुतालबा
किस किस
का करें हम
अब तुम्हें
अपने बहुत करीब
बहुत करीब महसूस
कर रहा हूं
किसी तरह की
खलल वलल
से दूर
अब तुम्हें
पुकारने से भी
वास्ता नहीं रहा
मैं कह रहा हूं
तो तुम्ही सुन रहे हो
यहां तक
मुझे लाने का
में जो गुजरा है
वो भी बेइंतेहा
बेहतर लगा
तरुण कुमार
लखनऊ
21/02/25
09:50 सुबह
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