सोचता हूं नींद आए
सोचता हूं नींद आए
क्या बात है
जिल्द दर जिल्द
निहारती ये निगाहें यार की
वो झुकी झुकी सी निगाह में
कुछ हरकतें बेशुमार हैं
इक दौर उन हवाओं का
ले चली कुछ उड़ा के यूं
के सिमट रहा हूं
खुद में यूं
जैसे आसपास
ही कोई छू रहा
करीब से
वो क्या था
जो महक रहा
फिजाओं में
कुछ दूर था
कुछ पास था
सहर से लेके शाम तक
तू अब तलक
यहीं तो था
न मैं न तू
न तू न मैं
सब कहां गया
तरुण कुमार
लखनऊ
11:11रात्रि
15/02/25
Comments
Post a Comment