न जाने क्या बोलती हो

ना जाने क्या क्या 
बोलती रहती हो
सोचता हूँ 
तुम्हारा क्या करूं 
करूं भी तो क्या करूं 
नहीं बोलती हो
तो भी तो बोलती हैं 
तुम्हारी निगाहें 
तुम्हारे अंदाज़ 
तुम्हारा करना कराना 
इतने काम इतने काम 
सोचता हूं तुम न
होती तो मैं 
कितना कुछ कर लेता 
तुमसे निगाहें क्या मिली 
की सब काम काज 
मेरे तो हो गए 
कितना बड़ा ये काम 
मेरी जिंदगी में बढ़ गया 
ये दिन रात 
जैसे हाथ पर हाथ
धर कर बैठ गए 
थे बहुत से काम बहुत काम के 
सब तुम्हारी निगाहें चाक 
में जैसे थम गए 
हम न जाने किस जहां 
में खो गए
एक तुम और 
एक तुम में मैं 
कहीं बस खो गए

तरुण कुमार 
लखनऊ 
11:30 रात्रि 
15/02/25

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