छिपी है सदियों की दास्तान
तुम्हारी मुस्कुराहट में
छिपी हुई है बीते पलों की दास्तां
सभी कुछ लफ्जों में बयां कैसे हो
कुछ राज़ हैं उस धुंधलके
सिमटी चादरों में
कुछ झुकी सी निगाह में
कुछ नुखूस उभरें मेरे जिस्म पर
तुम्ही कहो
सुबह के इन उजालों
थिरकती भड़कती
उलझती उंगलियों
क्या लिखा
भरी पूरी रात में
कुछ पढ़ सको
ख़ुद के लिखे अल्फ़ाज़
तुम
मेरी तसल्ली बख्श आंखों ने
कुछ कहा था
और तुमने सुना
वो कह सकोगे
या यूंही
दोहराओगे
आ तुझे
मैं चूम लूं
कुछ तो है
जो शेष है
*तरुण कुमार*
11:06AM
लखनऊ
04/12/24
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