शाम भी आई मगर तुम न आई

शाम भी आई मगर तुम न आई 
सोचा बहुत सोचा 
फिर सोचा कहीं 
फंस गई होगी 
इंतज़ार किया 
रात ढलने को आई 
बहुत बुदबुदाए 
बड़बड़ाया 
आँखें छोटी बड़ी की 
बड़बड़ाने में ज़ाहिर है 
ऐसा बहुत कुछ था 
जो तुम सुनती तो 
वाकई कभी लौट कर 
न आती 
ये सोचकर कि कहीं 
तुम आस पास ही न हो 
तो बुदबुदाने सा लगा था
बस इतना कुछ
हकीकत तो ये है उसमें भी 
अच्छा बुरा 
सब सोच डाला था
कितने कप चाय पी गया 
चिंतित भी हुआ 
सोचा बहुत सोचा 
कुछ दूर चला भी जाता 
फिर लौट आता 
न जाने कितने 
जतन करके आओ 
उस पर मैं ही नदारद 
तुम पर क्या बीतेगी 
कितना कुढ़ोगी 
मुझे कितना कुछ बोलोगी 
मेरे ऊपर तोहमतें 
थोपोगी 
मैं लौट आता हूं 
वहीं जहां 
तुमसे मिलना था 
तुम को मुझे ढूंढना 
न पड़े 
रात ढल गई 
मुझे अब इंतज़ार
की आदत हो गई है 
मगर तुम न आई 
जब आना 
तो मुझे जगा लेना 
गढ़ देना कोई 
सुंदर सा बहाना 
मुझे आदत जो 
हो गई है 
तुम्हारी
हर बात को सच मान लेने की 
और कोई कर भी क्या सकता है 
सिवा मान लेने के 
सुबह नया फूल 
तुम्हारे गजरे में टांक दूंगा। 
तुम्हारी खुशहाली की दुआ 
करते मैं तुमसे विदा लेता हूं।
तरुण कुमार 
३०/१२/२०२४
मुम्बई

Comments

Popular posts from this blog

मुझे तो बिटिया चाहिए

रूदाद

मज़दूर दिवस