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Showing posts from February, 2025

Listen to Me

Listen to Me How do I remember you How do I touch you How do I embrace you How can I do that? You are like an old song Forgotten dream of awake eyes You are an account of moments Lived in memories You are a complete book Wrapped in words What are you What do you know I want to humm All the words are silent I am listening to an old tune Your fragrance is all around What should I say how should I say Who are you! Tarun Kumar 02-11-2024 Lucknow

चेतन अचेतन

Raat bhi tum Aur Din bhi tum Kaliyan kaliyan chehki tum  Har baat baat may tum Aandhi aur toofan bhi tum Har lamhe lamhe may tum  Nadiya aur Sagar bhi tum  Har Sheetalta ki Shitalta may tum Mehki mehki khushbu may tum  Sath chehkti aur Mehkti tum Har saans may tum bas pran ho tum.  Aradhya ho tum palan har ho tum.  Drishti ho tum drishta bhi tumhi.  Seva ho tum satkar ho tum Jeewan ho jeewan ke khevan haar ho tum, Sankalp ho tum aur karna avtar ho tum. Budhhi ho tum aur vichar ho tum. [4/11/2024, 9:19 am] Tarun Kumar: Shesh bhi tum avshesh bhi tum.  Akaar bhi tum Nirakaar bhi tum.  Tej tumhi pratap tumhi Cheta aur Achetan tum तरुण कुमार  लखनऊ  04/11/24 09:20 सुबह 

धर्म

हमें धर्म का क ख ग़ भी नहीं मालूम  मगर धर्म युद्ध में कूदे हुए हैं किताबों में लिखे को ही  धर्म समझ लिया है।  बाँचना जांचना आता नहीं है किन्हीं मौजूदा बहुरूपियों के कहने को  धर्म समझ लिया।  इतना बौना और बे अक्ल है क्या तेरा धर्म की कोई भी औना पौना आकर बांच देगा अक्ल तो नाड़ा बांधने की भी नहीं जिनको वो बात करते हैं आदम और हौवा की इतिहास का ई जिनको मालूम न था। जुबान जिनको आती न थी कोई  उन्होंने हजारों साल पहले के शिला लेखों पर  विलायती भाषा में ग्रन्थ लिख दिए
वो अगर कुछ अलग है तो सवाल करो अगर बहुत अलग है  तो सवालों से भी परे है  तुम पर जो अपनी पूरी क़ायनात लुटा दे  उससे भी सवाल करते हो  तो तुम अपने को तौलो  उसको तो इस दायरे में मत घसीटो कैसे समझ गये तुम उसकी भाषा को  पहले ये बतालाओ  अंतर्मन में चला जो तुम्हारे  उसको तुमने गढ़ा उसका बतला कर तुम अपनी हस्ती पहचानो

छिपी है सदियों की दास्तान

तुम्हारी मुस्कुराहट में छिपी हुई है बीते पलों की दास्तां सभी कुछ लफ्जों में बयां कैसे हो कुछ राज़ हैं उस धुंधलके  सिमटी चादरों में  कुछ झुकी सी निगाह में कुछ नुखूस उभरें मेरे जिस्म पर तुम्ही कहो  सुबह के इन उजालों  थिरकती भड़कती  उलझती उंगलियों  क्या लिखा  भरी पूरी रात में कुछ पढ़ सको  ख़ुद के लिखे अल्फ़ाज़  तुम मेरी तसल्ली बख्श आंखों ने कुछ कहा था  और तुमने सुना वो कह सकोगे  या यूंही  दोहराओगे आ तुझे  मैं चूम लूं  कुछ तो है  जो शेष है  *तरुण कुमार*  11:06AM  लखनऊ 04/12/24

कौन सी कश्ती का सवार

जाने वो कौन सी कश्ती  का सवार निकला  हर लहर चीर कर  भंवर को  अपने चपपू की गिरफ्त से ढकेल  निकला

कहनी न कहनी

तुमसे कहनी  न कहनी  सब तो कह डाली  अब किस से कहते  कहनी तो बहुत सी बातें हैं  कभी तुम नहीं होती  कभी हम नहीं होते  रह जाती हैं  दिल की बातें  दिल में ही  घूमती फिरती  रहती हैं  रगों में  कभी दिल में  कभी दिमाग में  जुबां पर आती तो हैं  अल्फाजों से टकराती भी हैं  आवाज़ में तब्दील नहीं होती  जो तब्दील होती हैं  वो माकूल नहीं होती  लफ्ज़ उनको  हु बहू  संवार ने की  क़ूबत नहीं पैदा  कर पाते तरुण कुमार  27/10/24 11:40रात्रि  लखनऊ 

अब मैं तुमसे रूबरू होता हूं

अब मैं तुमसे ही रुबरु होता हूँ  बताओ तो कौन हो  कहां से हो  कब से हो  मेरे इर्द गिर्द  कहां जाना है  क्या चाहते हो तुम  कुछ बोलते क्यों नहीं  कबसे तो मैं  तुमसे मुखातिब हूं  कह दो जो भी कहना है मौका भी है दस्तूर भी है निभाना भी है और और क्या  बाकी सब  तो  यहीं रह जाना है तरूण कुमार  23/12/24 मुंबई

युद्ध की परिभाषा

युद्ध हम पर आगे भी होते रहेंगे  ये युद्ध नहीं हैं  युद्ध की परिभाषा तुम ही सोचो क्या ये होती है? षड्यंत्र होते हैं  पहले भी हुए हैं  आगे(भविष्य) भी होंगे होते रहेंगे  कुछ जीत का बिगुल बजायेंगे  तुम भूख शान्ति और पर्यावरण  की दुहाई के झंडे  बेशक लहराओगे  बेख़बर इन (सत्ताधारियों) के षड्यंत्रो से हार जीत दोनों ही पक्षों  की जनता  को हासिल  केवल भूख ही (होगी) हुयी। तरूण कुमार  मुंबई  २५\१२\२०२५

जंग के मायने

हड़प लिये गये हैं भूख और बेरोज़गारी  मजदूर के पसीने के असल मायने जंग में बिखरे  मांस के लोथडे  में फर्क करना कल कारखानों से गोला बारूद से निकलने वाले  धुयें में फर्क करना बदलते दौर में  बदलती इबारतें अब चीखती हैं अपने वजूद की ख़ातिर  तरूण कुमार  २५\१२\२०२४

तुम वही हम भी वही

तुम वही  हम भी वही  फिर बदला  तो क्या बदला  कसक वही  शिद्दत भी वही  पहली वाली  न तुम पहचान सकी  और मैं तो  सवाल के जवाब में  अब तक  इंतज़ार में  वो उम्मीद वो बेकरारी  आज भी  न जाने क्यों  वैसी की वैसी  मेरे साथ है कहीं नहीं जाती  कोई वादा  कोई करार  न तब  न अब  ये बताओ मुख्तसर में  यही सब तुम्हारे साथ  अभी तक है  की नहीं  तरुण कुमार  २५/१२/२०२४ मुंबई

तुम्हारी संवेदनशीलता

सम्वेदनशीलता के मायने  देखो  देखते ही देखते  क्या से क्या  हो गये  धीरे-धीरे  हम कब   आदमी से हैवान  हो गये  फ़िर भी हमारी  पहचान  इंसानों में हो गयी  क्या दौर आ गया  झूठ और सच  को भी  हमें चकमा देने में  महारत हासिल हो गई  झूठ भी सच का कालर  तान कर चलने लगा शर्मो हया के  मायने मीडिया ने पहले ही बदल कर  रख दिये जो चिल्ला कर  जितनी जल्दी  बोल दे  बस उसी झूठ  की माला पहन  सब चल पड़े  हम कौन सी माला अब पहन कर घूमें कोई अपनी माला डाल गया अब  झूठ भी मेरा  सच भी मेरा गलबहिंया डाले  झूल रहा है। *तरूण कुमार* २५\१२\२०२४ मुम्बई

कुछ चुरा लिया है तुमने

कुछ चुरा लिया  है तुमने  धीरे-धीरे  वो सब  जो था तो  प्यारा और सुंदर  निभ रहा था  भा भी रहा था  xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx साथ चल भी रहा था सिमट सा गया है  दुबक सा गया है  बुझ सा गया है  संभालो इसे  इसको रास्ते नये चाहिए  उजड़ी बिखरी  ऊबड़ खाबड़ राहों पर कब तक  घसीटोगे उसको  छिल गये हैं  अब तो किसी नई  राह को तलाशो  वो भी था ज़माना  कुछ और  कब तक उन्हीं लकीरों को  पिटोगे  नए कपड़े नए साज और श्रृंगार  नित करते तो हो  क्यों पुरानी कवायदों  कवायदों की खातिर बस अटके हो नया कुछ सोचते  क्यों नहीं हो  पुराना डेटा हटाओगे  न जब तक  नया कैसे  लाओगे तुम भी  हटाओ रुख से पर्दा  दिखाओ अपना जलवा ये दुनिया मिली है खिलाओ इसमें नय गुल  यही है वो दुनिया  जो उसने बनाई है  सब आयेंगे  जायेंगे  तुम्ही बनाओगे  जन्नत जहन्नुम  नहीं कोई और दुनिया  जब आना जाना ही नहीं  तो किसका हिसाब  किसकी किताब  न...

जंग जिनके दिलों में बसती है

जंग जिनके  ज़हन में  बसती है उन्हें बस्तियों से क्या लेना आओ कुछ जीने के  अंदाज ही बदलें बहते खून के रंग को  सफेद करने के  तौर तरीके ही बदलें तुमको कतलो गारत के  नये अंदाज सीखने होंगे कुछ बदले न बदले इंसानियत अगर  तुममें होती तो इंसान होने को  कोई क्यों कहता तुमको तो  औजारों का जखीरा  रखना और  उन पर धार तेज करना  तुम मोहब्बत करना  वो खुद ब खुद  परमाणु बम  में तब्दील होगा किसी को कोई  तकलीफ़ नहीं होगी  उनके दुध मुहे बच्चे  तो कबके फिदायीन  हो चुके  तुम उस गुनाह  से साफ बच गये कानून की  किसी धारा में  तुम पर कोई  इल्ज़ाम नही गुज़री नस्लें  तुम पर फक्र करेंगी तुमने जिस मोहब्बत  से और तरतीब से मोहरे  बिछाये   की कब्र में  जाने की भी  नौबत न आई ऐसी बदनसीब  मौतों को देते तुमने न सोचा  जमाना भी कैसा जिसने  मौतों में भी  इंसानो के फिरके और झंडे पहचान कर मातम में  आवाज़ उठाई न तुम बाज आये  न वो बाज आये  दानिशमं...

तुम्हारी मुस्कुराहट में छुपी है

तुम्हारी मुस्कुराहट में छिपी हुई है बीते पलों की दास्तां सभी कुछ लफ्जों में बयां कैसे हो कुछ राज़ हैं उस धुंधलके  सिमटी चादरों में  कुछ झुकी सी निगाह में कुछ नुखूस उभरें मेरे जिस्म पर तुम्ही कहो  सुबह के इन उजालों  थिरकती भड़कती  उलझती उंगलियों  क्या लिखा  भरी पूरी रात में कुछ पढ़ सको  ख़ुद के लिखे अल्फ़ाज़  तुम मेरी तसल्ली बख्श आंखों ने कुछ कहा था  और तुमने सुना वो कह सकोगे  या यूंही  दोहराओगे आ तुझे  मैं चूम लूं  कुछ तो है  जो शेष है  *तरुण कुमार*  11:06AM  लखनऊ 03/11/2024

सुनो तो तुमको कैसे याद करूं

सुनो तुमको  कैसे-कैसे याद करूँ मैं  कैसे छू लूँ  लिपटा कर मैं  ख़ुद में भर लूँ  ऐसे कैसे ? जागती आँखो का सपना  भूला बिसरा  कोई पुराना  गीत हो तुम  यादों में बसी  लम्हों का कोई  हिसाब हो तुम  लफ़्ज़ों में लिपटी  एक मुक्कमल  किताब हो तुम  तुम क्या हो   ये तुम क्या जानो  गुन गुनगुनाना चाहता हूं  शब्द सब ख़ामोश हैं  सुन रहा हूं धुन पुरानी  खुशबु तुम्हारी इर्द गिर्द है  क्या कहूँ कैसे कहूँ  तुम कौन हो! *तरुण कुमार*  03-11-2024 लखनऊ 

दिवाली वाली अमावस्या ख़त्म क्यों नहीं होती

अभी कई दिनों से दीवाली वाली  अमावस्या ख़त्म क्यों नहीं हुई  इस तरह की रोशनी चारों तरफ है  जैसे कोई जश्न मना रहा है  हमारी संस्कृति और त्योहारों की  नुमाइश सी लग गई है  हमें उघाड़ उघाड़ कर  हमारे जिस्म की बाज़ार लगाई जा रही है  ताज्जुब है फिर भी कोई देखता क्यों नहीं है  सब तरफ लोग  आंखों में पट्टी बांधे  न जाने कौन सी लकड़ी को पकड़े  चले नहीं बहे जा रहे हैं  मैं चाहूं रोकना  तो नाम पूछते हैं  गांव पूछते हैं  बाप दादा का इतिहास पूछते हैं  मैं कहता हूं मेरा नाम विवेक है  मैं भूखा हूं  मेरी भूख उनकी भूख  से वजन में कहीं कुछ नहीं है  अमावस की महा घनी रात में  इस चमक चौंध से भरपूर रात में  मैने विकास को ढूंढा  वो इस चमक में इस दमक में  कहीं खो गया था  या जुमलो के बीच में  लापता हो गया था  संभालो संभालो  मेरा विश्वास डगमगा सा गया है

बहुत मज़ा तो है बड़बड़ाने में

बड़बड़ाने में ज़ाहिर है  ऐसा बहुत कुछ था  जो तुम सुनती तो  वाकई कभी लौट कर  न आती  ये सोचकर कि कहीं  तुम आस पास ही न हो  तो बुदबुदाने सा लगा था बस इतना कुछ हकीकत तो ये है उसमें भी  अच्छा बुरा सब सोच डाला था

शाम भी आई मगर तुम न आई

शाम भी आई मगर तुम न आई  सोचा बहुत सोचा  फिर सोचा कहीं  फंस गई होगी  इंतज़ार किया  रात ढलने को आई  बहुत बुदबुदाए  बड़बड़ाया  आँखें छोटी बड़ी की  बड़बड़ाने में ज़ाहिर है  ऐसा बहुत कुछ था  जो तुम सुनती तो  वाकई कभी लौट कर  न आती  ये सोचकर कि कहीं  तुम आस पास ही न हो  तो बुदबुदाने सा लगा था बस इतना कुछ हकीकत तो ये है उसमें भी  अच्छा बुरा  सब सोच डाला था कितने कप चाय पी गया  चिंतित भी हुआ  सोचा बहुत सोचा  कुछ दूर चला भी जाता  फिर लौट आता  न जाने कितने  जतन करके आओ  उस पर मैं ही नदारद  तुम पर क्या बीतेगी  कितना कुढ़ोगी  मुझे कितना कुछ बोलोगी  मेरे ऊपर तोहमतें  थोपोगी  मैं लौट आता हूं  वहीं जहां  तुमसे मिलना था  तुम को मुझे ढूंढना  न पड़े  रात ढल गई  मुझे अब इंतज़ार की आदत हो गई है  मगर तुम न आई  जब आना  तो मुझे जगा लेना  गढ़ देना कोई  सुंदर सा बहाना  मुझे आदत जो  हो गई है ...

ये कैसा बागबां यारों

ये कैसा बागबां है यारों  यहां हर शाख पर कुछ राख सा क्या है  हर गुल और बूटा-बूटा परेशान सा क्यों है ये दरख़्त ये पौधे सब खामोश से क्यों हैं  कोई हवा कोई पानी कोई माली   कोई पासबाँ भी नज़र नहीं आता  ये कैसा ख़ौफ़ पसरा है इसकी फिज़ा में  इसे तुम बाग कहते हो  कोई चिड़िया कोई कबूतर कोई पक्षी  यहां बसेरा क्यों नहीं करता  न कोई सोता पानी का  न खाने को कुछ मयस्सर  कैसा है ये बाग कहने को  सांकलों में बांध कर जिसे गुज़रे  वहीं मंसूर था ज़माने का  बहारों से न जाने  किसको इतना खौफ था चमन की खुशबू लूट ली उसने  बेइल्म का सितम सिर्फ खौफ देता है उसकी लाठी का इल्म से क्या लेना  तरुण कुमार  ३१/१२/२०२४ १०:५२ रात्रि

इधर उधर बिखरे जहां में

इधर उधर इस बिखरे जहां में जहां कपड़े फटे पुराने चीथड़े लपेटने का दौर हो  ख़्याल हैवानियत से लदे फंदे  ग़ैर जिम्मेदाराना  और  बेतरतीबी से चलती भेड़ चाल  बेशुमार वाहनों से  सड़के अटी पड़ी  जहां सड़कों फुटपाथ पर  चलने की रवायतों को  दर किनार कर  चलना जहां मुश्किल हो चुका है बेतरतीबी जिंदगी  इंसानी रगों का हिस्सा बन गई  पूरी कायनात शर्मिंदा होकर भी करे भी तो क्या करे गूंजती है छोटे दुध मुहै बच्चों की चीखें  औरतों के साथ होते जघन्य दुर्दांत वहशी कारनामों  से कोई हांथ उन्हें बचा लें  दुहाई देती आवाज़ें  इन बेबस बेगुनाहों  जिस्मों से इनकी रूहों  इतनी बेतरतीबी से जुदा करते ये बेरहम दिल  किन मांओं ने जन्में हैं  सुना था  धार्मिक किस्सों कहानियों  की किताबों में  हकीकत में  हैवान और फ़रिश्ते  लड़ते हैं ये तो सुना था  मौरडरन टैक्निक में  फ़रिश्ते इस दौड़ से  नदारद हैं  उनका सिर्फ़ नाम चलता है  मगर टैक्नीक की ये ब्यूटी है की  लगता है कि  जंग ...

मैं कार्ड होल्डर हूं

मैं कार्ड होल्डर हूं कमीनगी एक जगह करना ठीक है इतनी वफादारी सीखी नहीं इससे ज्यादा कुछ करूं  तो यकीं खुद से उठ जाएगा।  तुम्हे धोखा दूं ये मेरी फितरत नहीं  तुम्हारे साथ हूं तो ये क्या कम है तुम्हारा फार्मबरदार हूं ये शक्को सुभा  आखिर कब तक कितने सीने चाक कर  तुम्हारे दर तक आया हूं मोहब्बत में कितना कर लो  यकीं दिलाना मुश्किल ही होता है

मैं जीवन को समझने में गया नहीं

मैं जीवन को  समझने में गया नहीं  अबूझ को बूझने की  जुगत ही  समय व्यर्थ गंवाना  सा है वो अबूझा उसके सारे काम अबूझे

प्रेम का पक्षी

प्रेम का पंक्षी  जब आये  तब पंक्षी  बन संग उड़ना चुगना, गाना विचरण करना बहेलियों से  बचना इनका दाना मत चुगना प्रेम को प्रेम  तुम्ही ने किया है दूजा क्या जाने उसकी परिभाषा जो तुमने गढ़ी इस व्याकरण में संज्ञा सर्वनाम क्रिया  सम्बोधन सभी  तुम्हारे अपने हैं तरूण कुमार  लखनऊ  15/02/25 17:09 पी म

इस ज़हर बुझे से वक़्त में

इस ज़हर बुझे से  वक्त में  आओ कोई  ख़ूबसूरत सा साज़ उठाये  कुछ रंग  ख़ुशनुमा से बिखेर दें  जगमगा दें कुछ रोशनी  ना उम्मीद भरे माहौल में  कुछ गीत मोहब्बत से लबरेज गाये जायें सुलगते अंगारों से  आओ कुछ  उजड़े घरों में  किसी तट से हट कर दीप जलाये  आ रही हैं  आवाजें उस बदलाव  नई कोपलों से बदलते हालात  की सूरत गढ़ी कुछ जायेगी जब मैं अकेला होता हूँ  दूसरा कोई नहीं होता खुद से ही बाते करता हूं  हंसता हूं मुस्काता हूं  फिर आंसू बहते रहते हैं  बस बात इतनी सी है  समझाऊं तो क्या  समझाऊं कुछ कहते  मैं बावरा हो रहा हूँ

मजाज़ बने फिरते हो

लोग न जाने  क्यों  लफ्जों को तोड़ मरोड़ के  शायरी करते रहते हैं  अरे मोहब्बत तुमको होती है  कहर बरपा हर्फ  दर हर्फ करते हो  रूबरू जब होते हो तुम्हे अपनी कहनी न कहनी  तो आती नहीं  अकेले में कोना थाम के  कभी मजनू  तो  कभी देवदास बने  पब्लिक की हमदर्दी  बटोरते फिरते हो  उस चक्कर में  मोहल्ले भर की भाभियों  की नजरों में भाइयों का  जीना मोहाल करते हो  तुम्हारी ये बेजा हरकतें  जिनको तुम मोहब्बत के नाम  पर परोसते फिरते हो  ये मोहल्ले की जनानियों में  जब से उसका डोला उठा है  तुम वो आएगी  वो आएगी कहते  अमीनाबाद में फिरते हो तुम्हारी इन्हीं हरकतों से  मजाज़ का तमाशा हो गया  न जाने क्यों तुम लोग  मोहब्बत में फना होकर  लफ्जों का जनाज़ा  निकालते फिरते हो  न खुद चैन से रहते हो  न लफ्जों को चैन देते हो लफ्ज़ मजाज़ सब गुम हो गये  तरुण कुमार  लखनऊ  21/02/25 दोपहर 12:20

बात मुख्तसर सी इतनी है

बात सिर्फ इतनी सी  ही कहनी थी  की मेरी याददाश्त जाती रही  कमबख्त ख़ौफ के  मारे इश्क के झूठे  न जाने कितने  किस्से गढ़ गया थोड़ी सी हिम्मत  जो जुटा ली होती  मोहब्बत के तरानों  से दीवान न भरते  वाह वाही  के चक्कर में  इंसान से मक्कार  हो गए हैं  अब हाल ये है  न वो हैं  न वो ज़माना  दो मीठी बातें कह के  ले उड़ा  कल्लन पहलवान  कमीना  आदाब अर्ज़ है  तरुण कुमार  लखनऊ  21/02/25 12: 06 दोपहर

फर्क तब में और अब में

फर्क तब में और अब में हमने तुम्हे खोजना  छोड़ दिया है  ये समझना  वो समझना  या  ये समझाना  वो समझाना  ऐसा भी नहीं  की तुम्हे भुला रहा हूं  या मेरी याददाश्त जा रही है  बस बात बात में  लड़ना झगड़ना  उलाहने देना  आते जाते  फब्तियां कसना  इसका उसका  हुस्का लगाना  छोड़ दिया है ये न सोच लेना  की मैं कुछ बूढ़ा हो चला हूं  कमज़ोर हो चुका हूं  ये सारी बातें  तब की थीं  जब हम राहें सफर में थे  अब यूं समझ लो  इश्क परवान चढ़ चुका है  अब उन सारे पेचों खम  से निकल कर  उन तूफानी लहरों को पार कर  हौले से जब चली है  तो अब मुतालबा  किस किस  का करें हम  अब तुम्हें  अपने बहुत करीब  बहुत करीब महसूस  कर रहा हूं  किसी तरह की  खलल वलल  से दूर  अब तुम्हें  पुकारने से भी  वास्ता नहीं रहा मैं कह रहा हूं तो तुम्ही सुन रहे हो  यहां तक  मुझे लाने का  में जो गुजरा है  वो भी बेइंतेहा  बेहतर लग...

तुम खिल उठती थी

जब तुमको  पहले कभी  छूते थे तुम खिल उठती थी  चहक सी जाती  जैसे अर्से से  इंतजार सा था था तो था होता भी है होना भी  चाहिये भी वही सब  आखिर  कब तक  हद्द है न हो तो भी मुसीबत  हो तो  ज़माने की  अंधी दीवारों का  ये खौफ आखिर  ये बला क्या  है  अब है भी तो क्या  अपनी ख्वाहिशों  का दम किसकी  खातिर  मैं फ़ना कर दूं तरूण कुमार  लखनऊ  20/02/25 13:31 दोपहर

मेरा जिस्म जिस्म मांगता है

मेरा शरीर  शरीर मांगता है  रगों में दौड़ते  नसों तैरते कणों को  मेहसूस करते  सीनों को सीने  से मिलाते  धड़कते सीनों को  पार कर  जिस्म की गर्मी  जिस्मों के  आर पार हो गयी न तुम समझे न हमीं समझे बस धोखेबाज  खामख्वाह हो गये जैसे सब हमी को था तुम तो नादान थी तकिये पर सर  इस बल उस बल  करती रही हटने को कहती तो वफादारी का जलवा हम भी  न दिखाते तो  कहती चलो खैर छोड़ो  अब तो पक गयी हो। तरूण कुमार  लखनऊ  18/02/25 23:34 रात्रिभोज

हसरतों भरी निगाहें

वो उन्हीं  हसरतों भरी  निगाहों से  देखती  मेरे सामने से  गुज़र गई  कोई साथ था  जिसके साथ  मजबूर सी  चली गई  बस वो मुझे यूं  न देखती  मुझे शुकून  रहता ये क्या  ही हो गया  यूं पल भर  की निगाहे  ज़बान में  वो जो  तब न उजड़ा  आज उजड़ कर  बिखर गया  तरुण कुमार  लखनऊ  18/02/25 11:04 रात्रि

न जाने क्या बोलती हो

ना जाने क्या क्या  बोलती रहती हो सोचता हूँ  तुम्हारा क्या करूं  करूं भी तो क्या करूं  नहीं बोलती हो तो भी तो बोलती हैं  तुम्हारी निगाहें  तुम्हारे अंदाज़  तुम्हारा करना कराना  इतने काम इतने काम  सोचता हूं तुम न होती तो मैं  कितना कुछ कर लेता  तुमसे निगाहें क्या मिली  की सब काम काज  मेरे तो हो गए  कितना बड़ा ये काम  मेरी जिंदगी में बढ़ गया  ये दिन रात  जैसे हाथ पर हाथ धर कर बैठ गए  थे बहुत से काम बहुत काम के  सब तुम्हारी निगाहें चाक  में जैसे थम गए  हम न जाने किस जहां  में खो गए एक तुम और  एक तुम में मैं  कहीं बस खो गए तरुण कुमार  लखनऊ  11:30 रात्रि  15/02/25

सोचता हूं नींद आए

सोचता हूं नींद आए  क्या बात है  जिल्द दर जिल्द  निहारती ये निगाहें यार की वो झुकी झुकी सी निगाह में  कुछ हरकतें बेशुमार हैं इक दौर उन हवाओं का  ले चली कुछ उड़ा के यूं के सिमट रहा हूं  खुद में यूं जैसे आसपास  ही कोई छू रहा  करीब से  वो क्या था  जो महक रहा  फिजाओं में कुछ दूर था  कुछ पास था  सहर से लेके शाम तक  तू अब तलक  यहीं तो था  न मैं न तू न तू न मैं सब कहां गया तरुण कुमार  लखनऊ  11:11रात्रि 15/02/25