इस दौरे ज़माने में

इस दौर में हर बात पर 
यकीं करते हो 
हर चीज़ खूबसूरत भी 
नज़र तो आती है 
एक दो नहीं सारे शहर 
स्मार्ट सिटी से लगते हैं 
प्रोग्रेस के नाम पे जो देखते हो
रंग रोगन से ढके पुते से
फाईबर के ढांचों पर 
ईमान लुटाए बैठे हो 
आंखों पे चादर चढ़ी हुई है
जो फटती भी नहीं है 
काल महाकाल सबका 
हाल तुम देख चुके हो
हमने माना के 
तुम चोट खाए हो 
विकास जितना शोर है बरपा 
हकीकत थोड़ी है 
कैसे तुम नादान हो भाई 
मीडिया और सोशल रील
के दस्तूरे ज़माने दौर में 
वक्त खपाए बैठे हो 
जो जैसा दिख रहा है 
नुमाइशी खेल है ठेकेदारों का 
चौपड़ बिछी है राहों में 
अब कौरव कोई और नहीं 
सोशल मीडिया से हारे बैठे हो 
व्हाट्सएप मैं घुसो और घुसो 
महंगाई का भूले बैठे हो 
जितना दिख रहा है 
पांडवों के रंग महल सा 
एक हसीन छलावा है
जहां थल दिखला रहा 
वहां थल नहीं है 
द्रौपदी हंस रही है 
अंधपिता के अंधपुत्रों 
फेक डिग्रीयों बांटने वाली 
कितनी युनिवर्सिटी आ गई 
जो सब्जेक्ट कभी सुने नहीं 
उन विषयों पर शोध कर लिया 
जिसका कोई प्रोफेसर छोड़ो
टीचर भी नहीं 
तुम सब कुछ लुटा के 
चिल्लाओगे तो तब तक
देर बहुत हो जायेगी
खर्चे इतने बढ़े हुए हैं 
टैक्स पर टैक्स लगे हुए हैं
पैसा बहुत लगाकर 
झोला एक दम हल्का 
घर में नहीं दाना 
घरवाली अब मुंह ताके 
घोल घाल के
कुछ पीस पास के 
बच्चों को बहला फुसला कर
मन की बात सुना के 
उसने सुला दिया है
बच्चे उनके पांच सौ 
हज़ार के नोटो से 
विदेशों में एक्सपोर्ट 
इंपोर्ट का खेल खेल रहे हैं 
देश हमारा बदल गया है 
जहां भी देखो विकास 
ही विकास बिक रहा 
गंगा से वोल्गा नदी तक 
साफ यानि साफ ही 
हो गयी है
मंत्री महोदया 
ढुंढो रे साजना
अब नाले तो किसीको
बुलाते नहीं है 
विकास हुआ है 
नालों में मेरे क्रुज़ चल रहे हैं 
ऐसा वैसा हल्का फुल्का नहीं 
सबका विकास है 
गाओ खुशी के गीत 

तरुण कुमार 
लखनऊ 
१८/०३/२०२५
०४:४५ शामइस दौर में हर बात पर 
यकीं करते हो 
हर चीज़ खूबसूरत भी 
नज़र तो आती है 
एक दो नहीं सारे शहर 
स्मार्ट सिटी से लगते हैं 
प्रोग्रेस के नाम पे जो देखते हो
रंग रोगन से ढके पुते से
फाईबर के ढांचों पर 
ईमान लुटाए बैठे हो 
आंखों पे चादर चढ़ी हुई है
जो फटती भी नहीं है 
काल महाकाल सबका 
हाल तुम देख चुके हो
हमने माना के 
तुम चोट खाए हो 
विकास जितना शोर है बरपा 
हकीकत थोड़ी है 
कैसे तुम नादान हो भाई 
मीडिया और सोशल रील
के दस्तूरे ज़माने दौर में 
वक्त खपाए बैठे हो 
जो जैसा दिख रहा है 
नुमाइशी खेल है ठेकेदारों का 
चौपड़ बिछी है राहों में 
अब कौरव कोई और नहीं 
सोशल मीडिया से हारे बैठे हो 
व्हाट्सएप मैं घुसो और घुसो 
महंगाई का भूले बैठे हो 
जितना दिख रहा है 
पांडवों के रंग महल सा 
एक हसीन छलावा है
जहां थल दिखला रहा 
वहां थल नहीं है 
द्रौपदी हंस रही है 
अंधपिता के अंधपुत्रों 
फेक डिग्रीयों बांटने वाली 
कितनी युनिवर्सिटी आ गई 
जो सब्जेक्ट कभी सुने नहीं 
उन विषयों पर शोध कर लिया 
जिसका कोई प्रोफेसर छोड़ो
टीचर भी नहीं 
तुम सब कुछ लुटा के 
चिल्लाओगे तो तब तक
देर बहुत हो जायेगी
खर्चे इतने बढ़े हुए हैं 
टैक्स पर टैक्स लगे हुए हैं
पैसा बहुत लगाकर 
झोला एक दम हल्का 
घर में नहीं दाना 
घरवाली अब मुंह ताके 
घोल घाल के
कुछ पीस पास के 
बच्चों को बहला फुसला कर
मन की बात सुना के 
उसने सुला दिया है
बच्चे उनके पांच सौ 
हज़ार के नोटो से 
विदेशों में एक्सपोर्ट 
इंपोर्ट का खेल खेल रहे हैं 
देश हमारा बदल गया है 
जहां भी देखो विकास 
ही विकास बिक रहा 
गंगा से वोल्गा नदी तक 
साफ यानि साफ ही 
हो गयी है
मंत्री महोदया 
ढुंढो रे साजना
अब नाले तो किसीको
बुलाते नहीं है 
विकास हुआ है 
नालों में मेरे क्रुज़ चल रहे हैं 
ऐसा वैसा हल्का फुल्का नहीं 
सबका विकास है 
गाओ खुशी के गीत 

तरुण कुमार 
लखनऊ 
१८/०३/२०२५
०४:४५ शाम

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