मां बहन बेटी और पत्नी
मां बहन बेटी
शक्ति स्वरूपा
अर्धांगिनी
सहचरिणी
मत कहो इन
गढ़े हुए दिनों में
मेरी प्रशंसा
तुम मुझे घूरना कब बंद करोगे
तुम मेरे शरीर से
कब विचलित होना
छोड़ोगे
कब मेरी देह को
मांस समझकर तौलोगे
इन कोरे शब्दों से
तुम कब खुद
शर्मिंदा होना सीखोगे
विज्ञान की तरक्की से तुम क्या सीखे हो
इज़्ज़त इज़्ज़त करने से नारी
की इज़्ज़त नहीं होती है
सौ ज़िल्द में
मैं ढक के भी चलूं
दुध मुही भी होउं
तो क्या
तुमहारी लार टपक ने लगती है
नब्ज़ पे काबू रहता नहीं
ईमान डोलने लगता है
एडवांस बहुत हम हो भी गये
ज़हनियत हमारी
घुटने में
और ख़्वाब में भी
कामना खूबसूरत
महिलाओं की
स्कूल से कॉलेज
फिर
ऑफिस तक के सफर में
चर्चा में सिर्फ औरत
औरत औरत
बचपन में लरकंईया में जो पाठ
पढ़ा
गुड़िया पीटा
गुड़िया भी बनाई
वो भी
घर की महिलाओं ने
फिर बीच सड़क पर पीटा तुमने
तुम वही रहे तनिक न बदले
इस रीत के
गहरे मायने भी
तर्क सहित समझा देगा
कोई सभ्य सुसंस्कृत
अभिलाषी पुरुष महिला
शादी के बाद
मेरे बनाए खाने में
वो मां का ज़ायका ढूंढे
ये सुन देख
तो मां ही इतराती है
कह दूं फिर अगर कहीं
मां से ही बनवाते
बिस्तर पर भी न जाने
तुम किसके ख़्वाब सजोए
मन मारे से अपनी
अपूर्ण कल्पनाओं
से समझौता करते होगे
ऑफिस में भी जाने
कैसे कैसी उपमाओं में
संगी साथियों संग बैठ
किन अंगों प्रत्यंगो
क्रिया कलापों का ज़िक्र
बड़े चटकारों के संग करते हो
तुम्हे लाज तनिक क्या आती है
जब महिला दिवस पर
झूठे बने बनाए संदेशों से
उपहास हमारा उड़ाते हो
गीतों में रचनाओं में
झूठे किस्से वादे और प्रशंसा लिखते हो
तुम वही हो
जो कभी किसी के
हो नहीं सकते
तुम मर्द जात रहते तो ज़मी पर
पर ख़्वाब जन्नती रखते हो
तुम क्या सत्कार करोगे मेरा
क्यों करोगे
क्या तुम इस हक़ के हक़दार भी हो
दिल में कुछ दिमाग में कुछ
अरमान हैं कुछ
तुम्हारी जुबां पे कुछ
तुम ख़ुद किसी की
इज़्ज़त के काबिल हो क्या
ख़ुद को देखो पहचानो
कितने हैवान हो तुम
कितनी जगहों और ठिकानों के
नाम ले ले कर तुमको गिनवाऊं
निर्लज्ज हो तुम सब
जज मुंसिफ सूबेदार
राजा मंत्री प्रहरी
तुमने कब इंसाफ किया
तुम्हारे कृत्यों का
क्या ही मैं बखान करूं
नहीं चले ख़ुद के औजार तो
लोहा लंगर रॉड से भी तुमने काम लिया
बीमार हो तुम
बीमारू समाज के कीड़े हो तुम
ये कहना भी
कीड़ों का अपमान है ये
आज का नहीं
सदियों का ये खेल तुम्हारा
औरत सिर्फ चीज़ और
उपभोग का बस सामान बनी
अपनी सुविधानुसार
गढ़े सब ग्रन्थ तुम्हीं ने
मर्द तो सारे पाक साफ
इस दुनिया और किसी
फ़तूनी दुनिया में भी
सुख सुविधाएं तुम्हारी खातिर
रची बनाई विधाता ने
उसको भी
बिन देखे जाने समझे
अपना सा ही पुरुष बताया
वाह री तेरी सोच रे बंदे
छल कपट और प्रपंच के बंदे
बन्द करो ये शब्द जाल
हम अपना सम्मान
स्वयंम कर लें गे
नही ज़रूरत तेरी है
तरुण कुमार
लखनऊ
०८:१५
०९/०३/२०२५
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