मेरी अपनी जिंदगी का सच

मेरी अपनी जिंदगी का सच 
मैं आज भी लड़ा 
कहनी न कहनी कहता रहा
विदीर्ण करता रहा 
अपने कटु शब्दों से
कष्ट देने का सुख भोगता रहा
वो रोती रही 
मैं हमेशा की तरह 
बेपरवाह 
अपशब्दों के तीखे 
तीव्र आरोपों के बाण 
चलाता रहा
वो अपनी सफाई में 
कुछ बोले
ऐसा मौका मैंने 
दिया ही नहीं 
मैं पुरुष हूं 
मेरे पैरों पर 
सर रख कर वो नाक 
रगड़े 
और मैं क्षमा करुं
जो गुनाह 
उसने किया ही नहीं 
क्या है मेरा पुरुषत्व?
इतना कमज़ोर 
कितना बलिष्ठ 
मैं हमेशा की तरह 
उसकी सहृदयता से
हारता रहा 
वो हराती रही 
मैं छाती फुलाता 
घूमता तो हूं 
कितना हारा हुआ हूं 
वो सब जानती है 
पर कहती नहीं 
कितना ऐहसान मंद हूं 
उसके रहमों करम से 
मैं पुरुष हूं 
वो...

तरुण कुमार 
लखनऊ 
१२:२७
०८/०३/२०२५

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