जितनी अच्छी बातें है जाहिल ही समझाते हैं
जितनी अच्छी बातें हैं
वो इतनी मुश्किल जुबानों
में क्यों लिखी हैं
जिन्हें समझने समझाने के लिये
किसी अहमक की ज़रूरत हो
जो सिर्फ लफ्ज़ ब लफ्ज़
ही पढ़ता और रटाता है
गहरी बातों के मायनों में
दुनियावी मक़सद ही
जिसको दिखते हैं
औरत और मर्द
मर्द और औरत के
फ़र्ज़ ही फ़र्ज़ के
सिवा कुछ और नहीं
कहां ले जायेगी
ऐसी चक्र घिन्नी सी
कोल्हू के बैल
सी जुती हुई सोच
गड़े मसलों से चिपकना
आख़िर कब तक
मौसमों से कुछ तो सीखो
बसंत पतझड़ और गर्मी
सावन बरसात और सर्दी
सब प्रकृति है
तुम इसके संग भी बेदर्दी से खेल रहे हो
ये उसकी है, जां भी उसकी ही दी हुई है
ये सब तुम चिल्ला चिल्ला कर
मान रहे हो फ़िर भी नाफरमानी
करते रहते हो
ज़हालत की कोई जात नहीं कोई धर्म नहीं
मौजूदा वक्त के लोग इसी ज़हालत पर कुर्बान
हो रहा और शान से सीना तान खड़ा
अपनी जलालत का परचम फहरा रहे
कोई तो इनसे खुलकर बोले
नई तारीखें तुमको पुकार रही
तुम इतिहास के पन्ने फाड़ रहे
वो इक अलग दौर की बातें थी
तबकी बातें और रवायतें तबकी थी
अब नई पेशवाज पहनते हो
हाथी घोड़े ऊंट छोड़
कार मोटर साइकिल दौड़ाते हो
अब हवा में बातें करते हो
मोबाइल फोन से चिपके रहते हो
खतो खिताबत बंद हुई
व्हाट्सएप पर बतियाते हो
हाथ में पिक्चर देखते हो
इक पल भी जीना पाओगे
फिर भी इतिहास में वापिस जाते हो
तो तुम्हारी जात पे
दोगलेपन पे तरस तो आता है
तरुण कुमार
०८:४८
लखनऊ
२२/०३/२०२५
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