मेरी आवाज़ तक तुम्हें रास आती नहीं
मेरी आवाज़ तो तुम्हे रास आती नहीं
कितनी कर्कश हो जाती है
सारी खूबसूरती ज़बान की
सड़ी सी जान पड़ती है
मत घोलों मेरे कानों में
अपनी इतनी बेसुरों से
लदी घटिया भाषा में
लिपटे चुपड़े शब्द
क्षमा शब्द भी
तुम्हारे लिए
तनिक उपयुक्त नहीं है
तुम टर जाओ
मेरी नज़र के सामने से
वो बददुआ के योग्य
भी नहीं समझती
देना भी चाहे तो
दे नहीं पाती
मैं लफ्ज़ डालता हूं
उसके मुंह में
वो फिर भी नहीं लेती
नारी है इसलिए नहीं
इंसानी फितरत की बात है ये
एक पुरुष रूपी गढ़ा
इंसान तो मैं भी हूं
सिर्फ गढ़ा ही क्यों हूं
रचा नहीं हूं
सौंदर्य के व्याकरण से मैं
मैं जो हूं
पुरुष
तरुण कुमार
लखनऊ
१२:४८
०८/०३/२०२५
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