तुमसे मिलना अच्छा लगता है

मैं तुमसे मिलता हूं 
तुम आती तो हो 
कैसे कहूं मैं क्या जानू 
ये सच है या वो सच है 
जीता दोनों को मैं ही हूं 
जीवन ऐसा ही तो होता है
कुछ निजी कुछ बहुत निजी 
कुछ मुआसरे का कुछ बेहद मुआसरे का 
ऐसा ही कुछ दोनों को जीता हूं 
बस जब से तुम लोग मुआसरे से गये
लेकिन जब तुम ख़्वाबों में आते हो 
मुझको मिलते हो बतियाते हो 
कुछ का कुछ करते 
डांटते मुस्काते प्यारी बातें करते 
पलक खुले चले जाते हो 
ऐसे ही तो तुम पलक मूंद कर 
लम्बी ख़ामोशी की चादर ताने 
इस दुनिया से चले गये थे 
इस जाने को,
दुनिया वालों ने देखा था 
अब ख़्वाबों का संसार निराला ही 
तो तेरे मेरे मेल जोल का डेरा है 
न जाने ये जीवन का सत्य है 
या वो जो 
बंद आंख में, 
पूरी निजता से जीता हूं
सच झूठ का भेद करूं क्यों 
मुझको तो मिलना भाता है 

तरुण कुमार 
लखनऊ 
०४:०६ मिनट शाम 
१९/०३/२०२५

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