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Showing posts from March, 2025

जितनी अच्छी बातें है जाहिल ही समझाते हैं

जितनी अच्छी बातें हैं  वो इतनी मुश्किल जुबानों में क्यों लिखी हैं  जिन्हें समझने समझाने के लिये  किसी अहमक की ज़रूरत हो जो सिर्फ लफ्ज़ ब लफ्ज़ ही पढ़ता और रटाता है गहरी बातों के मायनों में  दुनियावी मक़सद ही  जिसको दिखते हैं  औरत और मर्द  मर्द और औरत के  फ़र्ज़ ही फ़र्ज़ के सिवा कुछ और नहीं  कहां ले जायेगी  ऐसी चक्र घिन्नी सी  कोल्हू के बैल  सी जुती हुई सोच  गड़े मसलों से चिपकना  आख़िर कब तक  मौसमों से कुछ तो सीखो  बसंत पतझड़ और गर्मी सावन बरसात और सर्दी सब प्रकृति है  तुम इसके संग भी बेदर्दी से खेल रहे हो ये उसकी है, जां भी उसकी ही दी हुई है  ये सब तुम चिल्ला चिल्ला कर  मान रहे हो फ़िर भी नाफरमानी  करते रहते हो  ज़हालत की कोई जात नहीं कोई धर्म नहीं  मौजूदा वक्त के लोग इसी ज़हालत पर कुर्बान  हो रहा और शान से सीना तान खड़ा  अपनी जलालत का परचम फहरा रहे  कोई तो इनसे खुलकर बोले  नई तारीखें तुमको पुकार रही तुम इतिहास के पन्ने फाड़ रहे  वो इक अलग दौर की बातें ...

तुमसे मिलना अच्छा लगता है

मैं तुमसे मिलता हूं  तुम आती तो हो  कैसे कहूं मैं क्या जानू  ये सच है या वो सच है  जीता दोनों को मैं ही हूं  जीवन ऐसा ही तो होता है कुछ निजी कुछ बहुत निजी  कुछ मुआसरे का कुछ बेहद मुआसरे का  ऐसा ही कुछ दोनों को जीता हूं  बस जब से तुम लोग मुआसरे से गये लेकिन जब तुम ख़्वाबों में आते हो  मुझको मिलते हो बतियाते हो  कुछ का कुछ करते  डांटते मुस्काते प्यारी बातें करते  पलक खुले चले जाते हो  ऐसे ही तो तुम पलक मूंद कर  लम्बी ख़ामोशी की चादर ताने  इस दुनिया से चले गये थे  इस जाने को, दुनिया वालों ने देखा था  अब ख़्वाबों का संसार निराला ही  तो तेरे मेरे मेल जोल का डेरा है  न जाने ये जीवन का सत्य है  या वो जो  बंद आंख में,  पूरी निजता से जीता हूं सच झूठ का भेद करूं क्यों  मुझको तो मिलना भाता है  तरुण कुमार  लखनऊ  ०४:०६ मिनट शाम  १९/०३/२०२५

सुनो मुझे गरियाने का मन करता है

सुनो मुझे बहुत गुस्सा आता है  गरियाने का मन करता है  सड़क पर सभी इधर-उधर  कहीं भी कभी भी  कुछ भी करते हैं  समझ लीजिये  बिना सिग्नल दिए गाडी मोड़ भी देंगे  और रोक भी देंगे लाज़मी है ठोक भी देंगे ही  अपने बाप का क्या जाता है  लड़ने का चिल्लाने का मौक़ा मिलेगा  घर का सारा फ़्रस्ट्रेशन  भई यही तो निकलेगा   समय की पाबन्दी  हमारी छठी में  रखी ही नहीं गयी  हम एहसान फ़रामोशी के शीर्ष पर हैं  झूठ कपट मक्कारी हमारी रगों में है  उम्मीद हमसे ईमानदारी की  सबको है जो हमतो हैं ही नहीं  लेकिन दूसरे को मुगालता गजब का है  तो है  साली यही तो ठसक है  बड़ी भद्दी गालियां देता हूँ  आसपास के लोग कहते हैं  अबे शीशा पिघला के डालते हो  अपनी ज़बान से तुम  खा गयी सरकार  सारे हुकूक जनता के हमारी पीसी मासी  दिमाग से सरकी थी  घूम-घूम कर गरियाती थी  प्रधानमंत्री सुअर का  बोच्चा  ये वाला या वो वाला  साला क्या फ़र्क़ पड़ता है  गरीबी हटाओ, गंगा बचाओ  देश बच...

बीते सालों में बड़ा काम हुआ है

कुछ सालों में बहुत बड़ा काम हुआ है  भाई इतना हिन्दू मुसलमान हुआ है  जानते न थे जो क से कुरान वो  अब अहले हदीस जानते हैं  वाक़िफ न थे जो राम से वो  रामायण और वेदों पुराण जानते हैं  गली गली तो क्या मोहल्लों के भी नाम हो गए रोशन दरो दीवार हो गए  ये क्या, लोग हिंदू ये मुसलमान हो गए  बाकी सबके नामों निशा भी मिट गए  होली और ईद बकरीद दिवाली दशहरा त्योहारों के बस कुछ नाम भर रह गए हैं   सब सिमट के हिन्दू मुसलमान हो गए  आए हाय क्या ज़माना आ गया  न जाने क्यों अब हम इंसान नहीं  कुछ अर्से से बस हिंदू मुसलमान हो गए  अमा अरसा हुआ सुने बाकियों के नाम  सुना नहीं हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई  नारा था न आपस में सब हैं भाई-भाई  अमां कहां खो गए मेरे दो भाई कुंभ में  जो लोग न जानते थे भाषाओं की दूरियां दो सगी बहनों का मज़हब तलाश लिया उर्दू हिंदी को हिंदू मुसलमान कर दिया ज़बान का भी तलाक करवा दिया जिनको ज़बान  का अलिफ़ बे क ककहरे से ताल्लुक न था ज़रा हिंदू उर्दू से जन्मी  उनकी लाड़ली हिंदुस्तानी के बिना  ए...

इस दौरे ज़माने में

इस दौर में हर बात पर  यकीं करते हो  हर चीज़ खूबसूरत भी  नज़र तो आती है  एक दो नहीं सारे शहर  स्मार्ट सिटी से लगते हैं  प्रोग्रेस के नाम पे जो देखते हो रंग रोगन से ढके पुते से फाईबर के ढांचों पर  ईमान लुटाए बैठे हो  आंखों पे चादर चढ़ी हुई है जो फटती भी नहीं है  काल महाकाल सबका  हाल तुम देख चुके हो हमने माना के  तुम चोट खाए हो  विकास जितना शोर है बरपा  हकीकत थोड़ी है  कैसे तुम नादान हो भाई  मीडिया और सोशल रील के दस्तूरे ज़माने दौर में  वक्त खपाए बैठे हो  जो जैसा दिख रहा है  नुमाइशी खेल है ठेकेदारों का  चौपड़ बिछी है राहों में  अब कौरव कोई और नहीं  सोशल मीडिया से हारे बैठे हो  व्हाट्सएप मैं घुसो और घुसो  महंगाई का भूले बैठे हो  जितना दिख रहा है  पांडवों के रंग महल सा  एक हसीन छलावा है जहां थल दिखला रहा  वहां थल नहीं है  द्रौपदी हंस रही है  अंधपिता के अंधपुत्रों  फेक डिग्रीयों बांटने वाली  कितनी युनिवर्सिटी आ गई  जो सब्जेक्ट कभी सुने...

मेरी आवाज़ तक तुम्हें रास आती नहीं

मेरी आवाज़ तो तुम्हे रास आती नहीं  कितनी कर्कश हो जाती है सारी खूबसूरती ज़बान की  सड़ी सी जान पड़ती है  मत घोलों मेरे कानों में  अपनी इतनी बेसुरों से लदी घटिया भाषा में  लिपटे चुपड़े शब्द  क्षमा शब्द भी तुम्हारे लिए  तनिक उपयुक्त नहीं है  तुम टर जाओ  मेरी नज़र के सामने से  वो बददुआ के योग्य  भी नहीं समझती  देना भी चाहे तो  दे नहीं पाती  मैं लफ्ज़ डालता हूं  उसके मुंह में  वो फिर भी नहीं लेती  नारी है इसलिए नहीं इंसानी फितरत की बात है ये  एक पुरुष रूपी गढ़ा  इंसान तो मैं भी हूं  सिर्फ गढ़ा ही क्यों हूं  रचा नहीं हूं  सौंदर्य के व्याकरण से मैं  मैं जो हूं  पुरुष  तरुण कुमार  लखनऊ  १२:४८ ०८/०३/२०२५

मेरी अपनी जिंदगी का सच

मेरी अपनी जिंदगी का सच  मैं आज भी लड़ा  कहनी न कहनी कहता रहा विदीर्ण करता रहा  अपने कटु शब्दों से कष्ट देने का सुख भोगता रहा वो रोती रही  मैं हमेशा की तरह  बेपरवाह  अपशब्दों के तीखे  तीव्र आरोपों के बाण  चलाता रहा वो अपनी सफाई में  कुछ बोले ऐसा मौका मैंने  दिया ही नहीं  मैं पुरुष हूं  मेरे पैरों पर  सर रख कर वो नाक  रगड़े  और मैं क्षमा करुं जो गुनाह  उसने किया ही नहीं  क्या है मेरा पुरुषत्व? इतना कमज़ोर  कितना बलिष्ठ  मैं हमेशा की तरह  उसकी सहृदयता से हारता रहा  वो हराती रही  मैं छाती फुलाता  घूमता तो हूं  कितना हारा हुआ हूं  वो सब जानती है  पर कहती नहीं  कितना ऐहसान मंद हूं  उसके रहमों करम से  मैं पुरुष हूं  वो... तरुण कुमार  लखनऊ  १२:२७ ०८/०३/२०२५

मां बहन बेटी और पत्नी

मां बहन बेटी  शक्ति स्वरूपा  अर्धांगिनी  सहचरिणी  मत कहो इन गढ़े हुए दिनों में  मेरी प्रशंसा  तुम मुझे घूरना कब बंद करोगे  तुम मेरे शरीर से  कब विचलित होना छोड़ोगे  कब मेरी देह को  मांस समझकर तौलोगे  इन कोरे शब्दों से  तुम कब खुद  शर्मिंदा होना सीखोगे विज्ञान की तरक्की से तुम क्या सीखे हो  इज़्ज़त इज़्ज़त करने से नारी  की इज़्ज़त नहीं होती है  सौ ज़िल्द में  मैं ढक के भी चलूं  दुध मुही भी होउं  तो क्या  तुमहारी लार टपक ने लगती है नब्ज़ पे काबू रहता नहीं  ईमान डोलने लगता है  एडवांस बहुत हम हो भी गये  ज़हनियत हमारी  घुटने में और ख़्वाब में भी कामना खूबसूरत  महिलाओं की  स्कूल से कॉलेज फिर  ऑफिस तक के सफर में  चर्चा में सिर्फ औरत  औरत औरत  बचपन में लरकंईया में जो पाठ  पढ़ा  गुड़िया पीटा  गुड़िया भी बनाई  वो भी  घर की महिलाओं ने  फिर बीच सड़क पर पीटा तुमने  तुम वही रहे तनिक न बदले इस रीत के  गहरे मायने भी...