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वो तुम्हारे खत के आने से पहले

 वो तुम्हारे खत के आने से पहले  गुज़र गया था  अब जो रह गया है  मलाल भर है  तब कहाँ थे  जब वो सब यहां था  अब तुम्हारी निगाहें क्या ढूँढेंगी कहाँ पाओगी वो नजर की तीरगी वो जब लपक कर थामा था हाँथ दुनियावी नजर से हट कर तुमने वो अजब था साथ  अब कहाँ हैं  वो गुम निगाहें वो बिखरी जुलफें  वो सहमी सांसे वो फैली बिन्दी  चमक रही है सीने पर अब तक वो तिरछी नजर से तकना लबों पर  लगे काजल को सूने नयन धधक रहे हैं सब कुछ अपना बांट रहे थे बंद नयन में शर्मो हया  सब सिमट के कैसे भूली पड़ी थी यही वो पल थे जिन्हें ही जिंदा रहना था। गुजर गया वो तुम्हारे खत के आने से पहले। तरूण कुमार  02-11-2024 लखनऊ  11:41 AM

सुनो तुमको कैसे याद करूँ

सुनो तुमको कैसे याद करूँ   मावा की रानी तुमको  कैसे-कैसे याद करूँ मैं  कैसे छू लूँ  लिपटा कर मैं  ख़ुद में भर लूँ  ऐसी कैसी  जागती आँखो का सपना  भूला बिसरा  कोई पुराना  गीत हो तुम  यादों में बसी  लम्हों का कोई  हिसाब हो तुम  लफ़्ज़ों में लिपटी  एक मुक्कमल  किताब हो तुम  तुम क्या हो   ये तुम क्या जानो  गुन गुनगुनाना चाहता हूं  शब्द सब ख़ामोश हैं  सुन रहा हूं धुन पुरानी  खुशबु तुम्हारी इर्द गिर्द है  क्या कहूँ कैसे कहूँ  तुम कौन हो! तरुण कुमार  02-11-2024 08:14 AM  लखनऊ

ये नयी सुबह भी

ये  नयी सुबह भी  ये  नयी सुबह भी कैसी मतलबी सी होती है  पुराना सब कुछ भुलाने को कहती है  मैं तुम्हे कैसे भूल जाऊं  यूँ इतनी जल्दी  तुम रोज़ आओगी जी मै ? रोज  ही आती  हूँ तुमसे नहीं पुछा मैंने उन यादों की बात कर रहा हूँ आती तो हूँ मगर तुम ही  ज़िंदगी की रफ़्तार में ऐसे डूब जाते हो भूल जाते हो की मैं ही हूँ जो रहती हूँ तुम्हारे साथ इन पेचीदा राहों से गुज़र के इक ठिकाना है मेरा दुबक कर छुप ही जातीं हूँ कई परतों का दुशाला ढांप कर मैं जब तुम कभी खामोश होते अपनी किसी ख़ुशी या ग़म में होते हो बिना  कुछ भी कहे ज़रा ज़ुल्फो को सेहलाते हो बस इक एहसास होते ही मैं छलक कर तुम्हारी आँखों में फिर कुछ देर यूँ ही ठहर कर तुम्हारी हथेलियों पर आती तो हूँ तुम्हारी हमसफ़र जो  हूँ तरुण कुमार

जब याद आये

जब याद आये  सोचता हूँ  क्या कहु  कैसे कहूं की तुम  आखिर हो तो  क्या हो  रोक लू ये जी चाहता तो है  मगर तुमको न रोकू दिमाग कहता है  कितने काम हैं तुमको उनका क्या होगा  चलो जाने दो  जब चली जाओगी  तभी तो कविता में आओगी  चलो जाओ तुम  बड़े काम बाकी हैं  मुझे भी तो  ये क्या बात हुई  जब मुझे काम होते हैं  तुम अपने काम न गिनाया करो  मेरे कामों को तुम क्या जानो  कब ये ताना है या कब एहसास  मुझे तुम अपने पास खींचो तो ज़रा  मेरी साँसों को तुमने ही तो भाँपा है  सोचता हूँ इस बार जब तुम जाओगी  एक कविता लिखूंगा लम्बी सी  उसके कानो में कहूंगा कुछ अपनी सी  उसके गालों को छूवूँगा हलके से  वो तिरछी आँखों से देखेगी  कहो कुछ कहना है क्या तुमको  अभी तो आयी हूँ वहां से मैं  तुम्हे कितना समय देकर  चली गयी वो उस रात कुछ  यूँ कह...

तुम भी वही हम भी वही

तुम वही  हम भी वही  फिर बदला  तो क्या बदला  कसक वही  शिद्दत भी वही  पहली वाली  न तुम पहचान सकी  और मैं तो  सवाल के जवाब में  अब तक  इंतज़ार में  वो उम्मीद वो बेकरारी  आज भी  न जाने क्यों  वैसी की वैसी  मेरे साथ है कहीं नहीं जाती  कोई वादा  कोई करार  न तब  न अब  ये बताओ मुख्तसर में  यही सब तुम्हारे साथ  अभी तक है  की नहीं  तरुण कुमार  २५/१२/२०२४ मुंबई

संवेदनशीलता के मायने

सम्वेदनशीलता के मायने  देखो  देखते ही देखते  क्या से क्या  हो गये  धीरे-धीरे  हम कब   आदमी से हैवान  हो गये  फ़िर भी हमारी  पहचान  इंसानों में हो गयी  क्या दौर आ गया  झूठ और सच  को भी  हमें चकमा देने में  महारत हासिल हो गई  झूठ भी सच का कालर  तान कर चलने लगा शर्मो हया के  मायने मीडिया ने पहले ही बदल कर  रख दिये जो चिल्ला कर  जितनी जल्दी  बोल दे  बस उसी झूठ  की माला पहन  सब चल पड़े  हम कौन सी माला अब पहन कर घूमें कोई अपनी माला डाल गया अब  झूठ भी मेरा  सच भी मेरा गलबहिंया डाले  झूल रहा है। *तरूण कुमार* २५\१२\२०२४ मुम्बई

तुम वही हम भी वही

तुम वही  हम भी वही  फिर बदला  तो क्या बदला  कसक वही  शिद्दत भी वही  पहली वाली  न तुम पहचान सकी  और मैं तो  सवाल के जवाब में  अब तक  इंतज़ार में  वो उम्मीद वो बेकरारी  आज भी  न जाने क्यों  वैसी की वैसी  मेरे साथ है कहीं नहीं जाती  कोई वादा  कोई करार  न तब  न अब  ये बताओ मुख्तसर में  यही सब तुम्हारे साथ  अभी तक है  की नहीं  तरुण कुमार  २५/१२/२०२४ मुंबई

वजूद कीमत

हड़प लिये गये हैं भूख और बेरोज़गारी मजदूर के पसीने  के असल मायने  जंग में बिखरे  मांस के लोथडे में  फर्क करना  कल कारखानों से गोला बारूद से निकलने वाले  धुयें में फर्क करना बदलते दौर में  बदलती इबारतें अब चीखती हैं अपने वजूद की ख़ातिर  तरूण कुमार  २५\१२\२०२४

जंग का आगाज़ होता रहेगा

युद्ध हम पर आगे भी होते रहेंगे  ये युद्ध नहीं हैं  युद्ध की परिभाषा तुम ही सोचो क्या ये होती है? षड्यंत्र होते हैं  पहले भी हुए हैं  आगे(भविष्य) भी होंगे होते रहेंगे  कुछ जीत का बिगुल बजायेंगे  तुम भूख शान्ति और पर्यावरण  की दुहाई के झंडे  बेशक लहराओगे  बेख़बर इन (सत्ताधारियों) के षड्यंत्रो से हार जीत दोनों ही पक्षों  की जनता  को हासिल  केवल भूख ही (होगी) हुयी। तरूण कुमार  मुंबई  २५\१२\२०२५

तुमने देर कर दी

वो तुम्हारे इंतजार में था  उसे मालूम था तुम आओगे  गिले शिकवे वो साथ ले गया  कुछ मलाल  मेरे साथ रह गया  कहनी सुननी  सब वही की  वहीं रह गई कुछ यादें  कुछ हरकतें  जो उसकी थी  सब यही यहीं की  यहीं रह गई 

वो जब याद आए

जब याद आये  सोचता हूँ  क्या कहु  कैसे कहूं की तुम  आखिर हो तो  क्या हो  रोक लू ये जी चाहता तो है  मगर तुमको न रोकू दिमाग कहता है  कितने काम हैं तुमको उनका क्या होगा  चलो जाने दो  जब चली जाओगी  तभी तो कविता में आओगी  चलो जाओ तुम  बड़े काम बाकी हैं  मुझे भी तो  ये क्या बात हुई  जब मुझे काम होते हैं  तुम अपने काम न गिनाया करो  मेरे कामों को तुम क्या जानो  कब ये ताना है या कब एहसास  मुझे तुम अपने पास खींचो तो ज़रा  मेरी साँसों को तुमने ही तो भाँपा है  सोचता हूँ इस बार जब तुम जाओगी  एक कविता लिखूंगा लम्बी सी  उसके कानो में कहूंगा कुछ अपनी सी  उसके गालों को छूवूँगा हलके से  वो तिरछी आँखों से देखेगी  कहो कुछ कहना है क्या तुमको  अभी तो आयी हूँ वहां से मैं  तुम्हे कितना समय देकर  चली गयी वो उस रात कुछ  यूँ क...

कश्मकश

बड़ी अजीब सी कश्मकश में हूं। करना भी है और छुपाना भी है। तुम्ही से है तो,  पर मालूम भी नहीं,  तुम्ही कहो  इस सूरते हाल का  कोई हल हो तो कहो  अर्से से इंतज़ार तो था इस लम्हे का  अब सामने ये कश्मकश  न जाने क्यों  है तो है  क्या करूं तुम्ही कहो  करूं तो क्या करूं उंगलियों में उंगलियां उलझी तो हैं ज़बाँ पर लफ्ज़  क्यों आते नहीं लटें बिखरी  न जाने कबसे बेकरार तो हैं कोई इनको संवारे तो क्यों संवारे  चेहरे पर पसीने की बूंदे  हैं तो हैं  कोई इनको समझे तो क्यों समझे तरुण कुमार 5 नवम्बर 2024

लम्हा लम्हा ही सरकी

 लम्हा लम्हा ही सरकी  मगर सरक ही  गयी वो ईक दबी सी आस वो वो लम्हे  सिमट कर वो भरी महफ़िल में मेरे पहलू में आकर यूँ सरक कर आ गई  सदियों पुराना  राग कोई  छेड़ गई  इक सरसराहट ने  हौले हौले  संगीत की  रंगीनियों ने  घेर कर  यूँ चूम कर पूछा उन ऋचाओं का नाम  मैंने कहा वो एक है  और चल दिया  जो साथ है  बादलों में  तारों की बारात में  उस सरकते चांद ने  धीरे से हौले से और सरकते  साथ में पूछा  तुम्हें कुछ याद है  तरुण कुमार 02-11-2024 लखनऊ  08:44 AM

वो निकल गयी

  रफ़्ता - रफ़्ता  ज़िंदगी रफ़्ता -रफ़्ता  गुज़रती चली गयी  एहसास तो था मगर कभी यूँ महसूस न हुआ  क्या था जो गुज़र गया इस दौर में  वो बचपन, वो बचपन की इक-इक याद  बैठा जो ये ख्याल तो न जाने कितनी तस्वीरें यूँ पल में गुज़र गयी  तोतली,तुतलाती,गिरती पड़ती,संभालती उम्र  बारिश की पहली फुहार में भीगने  की ज़िद  मीठी-मीठी मिट्टी की सोंधी ख़ुश्बू में  पागल ये मन न जाने क्या चाहता था मगर  सब कुछ कितनाबेख़बर था, कैसा था ये बचपन भी  पल जैसे कभी ठहरते ही न थे  दिन तो बड़ी बात थी,  सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम  शाम से रात और रात से सुबह  कैसी सपनो भरी रात होती  वो संगी वो साथी कोई भेद नहीं जानता था  बस एक साथी होता था  कभी नहीं आया था वो ख्याल वो पल ज़हन में की  ख़त्म हो जायेगा ये सब यूँ ही इतनी जल्दी  या एक एक दिन  है कोई मेरे और इस पल के बीच में  जहाँ से मुड़ते हैं हम  हैं मोड़ दर मोड़ इस राह में  धुंधली-धुंधली यादें कितनी अच्छी लगती हैं  वो अबोध बचपन  वो माँ  शायद कोई...

हैवान और फरिस्ते

ये जिंदगी ही बहुत थी न जाने क्यों तुमने फिरभी स्वर्ग और नरक हैं बनाये ये जिंदगी ही क्या कम थी ये लोग ही बहुत हैं न जाने क्यों तुमने फिर भी हैवान और फरिस्ते हैं बनाये ये लोग जैसे हैं बहुत हैं तरुण कुमार ०३/०२/ १९९६