लम्हा लम्हा ही सरकी
लम्हा लम्हा ही
सरकी
मगर सरक ही
गयी वो
ईक दबी सी
आस वो
वो लम्हे
सिमट कर वो
भरी महफ़िल में
मेरे पहलू में आकर
यूँ सरक कर आ गई
सदियों पुराना
राग कोई
छेड़ गई
इक सरसराहट ने
हौले हौले
संगीत की
रंगीनियों ने
घेर कर
यूँ चूम कर पूछा
उन ऋचाओं का नाम
मैंने कहा वो एक है
और चल दिया
जो साथ है
बादलों में
तारों की बारात में
उस सरकते चांद ने
धीरे से हौले से और सरकते
साथ में पूछा
तुम्हें कुछ याद है
तरुण कुमार
02-11-2024
लखनऊ
08:44 AM
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