वो निकल गयी

 रफ़्ता - रफ़्ता 

ज़िंदगी रफ़्ता -रफ़्ता  गुज़रती चली गयी 

एहसास तो था मगर कभी यूँ महसूस न हुआ 

क्या था जो गुज़र गया इस दौर में 

वो बचपन, वो बचपन की इक-इक याद 

बैठा जो ये ख्याल तो न जाने कितनी तस्वीरें यूँ पल में गुज़र गयी 

तोतली,तुतलाती,गिरती पड़ती,संभालती उम्र 

बारिश की पहली फुहार में भीगने  की ज़िद 

मीठी-मीठी मिट्टी की सोंधी ख़ुश्बू में 

पागल ये मन न जाने क्या चाहता था

मगर 

सब कुछ कितनाबेख़बर था, कैसा था ये बचपन भी 

पल जैसे कभी ठहरते ही न थे 

दिन तो बड़ी बात थी, 

सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम 

शाम से रात और रात से सुबह 

कैसी सपनो भरी रात होती 

वो संगी वो साथी कोई भेद नहीं जानता था 

बस एक साथी होता था 

कभी नहीं आया था वो ख्याल वो पल ज़हन में की 

ख़त्म हो जायेगा ये सब यूँ ही इतनी जल्दी 

या एक एक दिन 

है कोई मेरे और इस पल के बीच में 

जहाँ से मुड़ते हैं हम 

हैं मोड़ दर मोड़ इस राह में 

धुंधली-धुंधली यादें कितनी अच्छी लगती हैं 

वो अबोध बचपन 

वो माँ 

शायद कोई याद माँ के बगैर होती होगी 

वो पहला संबंध - वो स्पर्श का आभास 

वो स्पर्श से शुरू हुआ रिश्ता 

माँ का था 

फिर पहचानने का सिलसिला 

धीरे-धीरे 

ऑंखें - रिश्ते, प्यार, क्रोध,घृणा 

सब समझने लगी 

और बन गया और भर गया यादों का ज़खीरा 

खट्टी मीठी  यादों का 

जहाँ थे मिलने बिछड़ने के न जाने कितने अनगिनत किस्से 

याद करो वो नज़र 

जो ढूंढती हो 

माँ 


तरुण कुमार



पोस्ट कार्ड 


आज बरसों बाद मैंने तुम्हें खत लिखा 

मन से सब कुछ भुला चूका था 

अच्छी बुरी, बसी पुरानी सभी बातें 

खत लिखते वक़्त सोच रहा था 

अब पहला सा कुछ भी नहीं दोहराऊंगा 

इस खत में बरसों पहले घटित 

किसी याद का ज़िक्र नहीं था 

सच कहूं तो बड़ी मुश्किल से 

ये सब कुछ संभव हुआ था 

लेकिन न जाने कब 

इस खत ने 

तुम्हें लिखे उन पुराने खतों के साथ 

लिपट कर 

उन  पुराने खतों के मोड़ों के साथ 

इस नए खत ने भी जगह बना ली 


तरुण कुमार


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