ये नयी सुबह भी

ये  नयी सुबह भी 

ये  नयी सुबह भी
कैसी मतलबी सी होती है 
पुराना सब कुछ भुलाने को कहती है 
मैं तुम्हे कैसे भूल जाऊं 
यूँ इतनी जल्दी 

तुम रोज़ आओगी
जी मै ?
रोज  ही आती  हूँ
तुमसे नहीं पुछा मैंने
उन यादों की बात कर रहा हूँ

आती तो हूँ
मगर तुम ही  ज़िंदगी की रफ़्तार में
ऐसे डूब जाते हो
भूल जाते हो की

मैं ही हूँ
जो रहती हूँ तुम्हारे साथ
इन पेचीदा राहों से गुज़र के
इक ठिकाना है मेरा
दुबक कर छुप ही जातीं हूँ
कई परतों का दुशाला ढांप कर मैं

जब तुम कभी खामोश होते
अपनी किसी ख़ुशी या ग़म में होते हो
बिना  कुछ भी कहे
ज़रा ज़ुल्फो को सेहलाते हो

बस इक एहसास होते ही
मैं छलक कर तुम्हारी आँखों में
फिर कुछ देर यूँ ही ठहर कर
तुम्हारी हथेलियों पर आती तो हूँ
तुम्हारी हमसफ़र जो  हूँ
तरुण कुमार







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