वो तुम्हारे खत के आने से पहले

 वो तुम्हारे खत के आने से पहले 

गुज़र गया था 

अब जो रह गया है 

मलाल भर है 

तब कहाँ थे 

जब वो सब यहां था 

अब तुम्हारी निगाहें क्या ढूँढेंगी

कहाँ पाओगी वो नजर की तीरगी

वो जब लपक कर थामा था हाँथ

दुनियावी नजर से हट कर तुमने

वो अजब था साथ 

अब कहाँ हैं 

वो गुम निगाहें

वो बिखरी जुलफें 

वो सहमी सांसे

वो फैली बिन्दी 

चमक रही है सीने

पर अब तक

वो तिरछी नजर से

तकना लबों पर 

लगे काजल को

सूने नयन

धधक रहे हैं

सब कुछ अपना

बांट रहे थे

बंद नयन में

शर्मो हया 

सब सिमट के

कैसे भूली पड़ी थी

यही वो पल थे

जिन्हें ही जिंदा

रहना था।

गुजर गया वो

तुम्हारे खत के आने से पहले।


तरूण कुमार 

02-11-2024

लखनऊ 

11:41 AM

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