संवेदनशीलता के मायने

सम्वेदनशीलता के मायने 
देखो 
देखते ही देखते 
क्या से क्या 
हो गये 
धीरे-धीरे 
हम कब  
आदमी से हैवान 
हो गये 
फ़िर भी हमारी 
पहचान 
इंसानों में हो गयी 
क्या दौर आ गया 
झूठ और सच 
को भी 
हमें चकमा देने में 
महारत हासिल हो गई 
झूठ भी सच का कालर 
तान कर चलने लगा
शर्मो हया के 
मायने मीडिया ने
पहले ही बदल कर 
रख दिये
जो चिल्ला कर 
जितनी जल्दी 
बोल दे 
बस उसी झूठ 
की माला पहन 
सब चल पड़े 
हम कौन सी माला
अब पहन कर घूमें

कोई अपनी माला
डाल गया
अब 
झूठ भी मेरा 
सच भी मेरा
गलबहिंया डाले 
झूल रहा है।

*तरूण कुमार*
२५\१२\२०२४
मुम्बई

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