वो जब याद आए
जब याद आये
सोचता हूँ क्या कहु
कैसे कहूं की तुम
आखिर हो तो क्या हो
रोक लू ये जी चाहता तो है
मगर तुमको न रोकू दिमाग कहता है
कितने काम हैं तुमको उनका क्या होगा
चलो जाने दो
जब चली जाओगी
तभी तो कविता में आओगी
चलो जाओ तुम
बड़े काम बाकी हैं
मुझे भी तो
ये क्या बात हुई
जब मुझे काम होते हैं
तुम अपने काम न गिनाया करो
मेरे कामों को तुम क्या जानो
कब ये ताना है या कब एहसास
मुझे तुम अपने पास खींचो तो ज़रा
मेरी साँसों को तुमने ही तो भाँपा है
सोचता हूँ इस बार जब तुम जाओगी
एक कविता लिखूंगा लम्बी सी
उसके कानो में कहूंगा कुछ अपनी सी
उसके गालों को छूवूँगा हलके से
वो तिरछी आँखों से देखेगी
कहो कुछ कहना है क्या तुमको
अभी तो आयी हूँ वहां से मैं
तुम्हे कितना समय देकर
चली गयी वो उस रात कुछ
यूँ कहकर
आउंगी कभी फुरसत में तुम्हारे पास
बैठूंगी समंदर के किनारे
गिनूँगी चाँद के साथ कितने तारे हैं
भूल कहां पाओगी
मज़दूरों और किसानो की व्यथाओं को
समेटना चाहोगी बहुत कुछ
अपने दामन में
लिखोगी फिर संघर्ष की गाथा
जुड़े होंगे तुम्हारे हाँथ
उस टोली में जहां मेहनतकश की रोटी है
दिखेगा चाँद रोटी सा
तारे सभी मज़दूर होंगे
तुम समंदर भूल जाओगी
लिखूंगा फिर कभी
एक लम्बी सी कविता
तुम्हारे सुर को पकडूँगा
तुम्हारी ताल को जानूंगा
थिरकना चाहता हूँ
बजाना चाहता हूँ हारमोनियम
गीत गाना चाहता हूँ
सिर्फ इतना के तुम सुनो
तुम गाओ तो वो गीत ज़रा
लिखूंगा एक लम्बी कविता
सिर्फ जिसे तुम गुनगुना लेना
तरुण
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