हैवान और फरिस्ते

ये जिंदगी ही बहुत थी
न जाने क्यों तुमने फिरभी
स्वर्ग और नरक हैं बनाये
ये जिंदगी ही क्या कम थी

ये लोग ही बहुत हैं
न जाने क्यों तुमने फिर भी
हैवान और फरिस्ते हैं बनाये
ये लोग जैसे हैं बहुत हैं

तरुण कुमार
०३/०२/ १९९६



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