माता पुत्र का संवाद

माता पुत्र का संवाद
(अवधी भाषा में एक कविता)

माता तेनी पापा पूछिन
चलो अम्मा तुमका और कउनो
अब नये शहर मां घुमाये लाई
माता बोली चुप्पे बैइठो
बहुत घुमाऐव होइगा बच्चा 
मोही बुढ़िया का कैता घुमहियो
सब जगह तो बच्चा 
वई कारी कारी सड़कै हैं 
वई नदियां और वई तलाव 
वई मोटरै और वई मनई वई मेहरियां 
वई मन्दिर वई इमारतें
वहै आसुमान वई चिरैया, चमगादड़ 
का कोई चीन्हें मिलत है, कैता देखी
वई टिरेने वई पटरी का जालु सब कैईती 
वई बसै, वई तांगा, एक्का हैं बच्चा 
वहै जबान चाहे जउन खवाओ 
यही जीभु का जिव नहीं भरत है 
भले पेटु भर जाय, 
जिव का पकरे क परत है।
भइया तुम अपने काम करो
दुई पईसा जोआरो कामै अहिहैं।
आगे काम परे हैं ढेरन।
पापा फिर चुप्पाये रहे, 
हंसी कै माता की बातन की थाह 
पकरि लिहिन और बिचार फिर करै लागि
फिर किस्सा होयी गयी माता हमरी

तरुण कुमार शुक्ल 
बनारस रात्रि ११:३३
(माता =अजिया, जिव=मन

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