चले भी आओ

कुछ जिंदगी झूम झूम 
कहती तो है 
तुम कायनात के 
इशारे तो समझो 
राहों में बिखरे पड़े हैं 
खत तमाम हसरतों के 
सुनो तो सुनो 
झंकार इनकी 
रंगीनियां पुकारती 
चल रही 
कदम ब कदम 
साध कर उम्मीद 
दर ब दर 
चले भी आओ 
और कितना इंतज़ार 
बाकी है बहुत सी शाम 
हथेलियों में ढलती उतरती
रात सिमटने को बेताब 
चले भी आओ 
तरुण कुमार 
लखनऊ 
10:24रात्रि
०६/०४/२०२५

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