मेरे बाबा का गांव

मेरे बाबा का गांव

वो मेरे बाबा का गांव 

बाबा के घर में बाबा का कमरा 

सामने खलिहान में मढ़नी माढ़ते  शम्भू काका 

साथ में रामेसुर बड़े, मसखरी करता रजिंदे 

अकसर गांव में रजिंदे का बप्पा रामऔतार 

हमारे बाल बनाता था

 गांव का नाम सामने आते ही 

न जाने कितने नाम, चेहरे 

याद आते हैं 

फिर मुझे यही लगता 

ये गांव मेरा ही नहीं 

ये तो रजोले सढोले बचोले 

विजईया और चरसी पुदुनू का गॉव है 

हाँ यही सच है 

क्योंकि 

अब वो गॉव 

गाँव नहीं 

याद है 

जहाँ शहर से मुख़्तलिफ़ कुछ भी नहीं है।    


तरुण कुमार 



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३-

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४-

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