वो खिड़की जो खुली
ना जाने क्यों
वो खिड़की जो खुली
तो है
पर न जाने क्यों
बंद से हालात क्यों
अर्से से तक रहा हूं
हवाओं के दौर में
मौसम का बदलना
बदस्तूर चल रहा
पर्दा तो है
सरका के दरकिनार
आहटें भी मिल रही हैं
खिड़की के पार की दीवार
साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ भी तो है
रोशनी की आमद भी ख़ूब है
धड़कने भी साफ सुन रहा हूं
आंखों का उठना झुकना
मिलना मिलाना मुक्कमल है
बस लम्हों का मिलना मिलाना
तलब का तलबी में तब्दील होने
का इंतजार है
तरुण कुमार
लखनऊ
२०/०४/२०२५
१०:३०सुबह
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