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मुझे तो बिटिया चाहिए

*मुझे तो बिटिया चाहिए* मुझे तो बिटिया चाहिए मुझे तो बेटा चाहिए  क्या हुआ ? तुम्हारी मुराद  बेटियां बाप की  लाडली होती हैं  उनका संसार होती हैं,  दूसरे के घर का सम्मान होती हैं  नहीं भेजूंगा कहीं अपनी  लाडो को  बचपन में मुनिया  बाबा की लाडो नाजों नखरों से संवरी इतराती बलखाती इठलाती  लहराती बहलाती दामन में घुसती समाती राहत की पुड़िया तुतलाती मुस्काती  दिन रात को महकाती,  बस्ता ले चलती  किताबें संभाले डिग्री उछालती मुक्त ख्याल सी,  बाबुल की डेहरी से निकली अम्मा से लिपटी डोली में जाती  पिया को संभाले  अभी बच्चे संभाले अब दुनिया संभाले, दुनिया की हर जंग संभाले  तुझे नाज़ से देखे दुनिया  गली की हैवान नज़रों  से बच कर  किया नाम रोशन,  तुम कब मुक्त ख्याल से जीवन की व्याकरण  एक इबारत बन गई तू कब मां बन गई  मेरी नन्ही बिटिया  तेरे किस रूप को  मैं कब तक निहारूं  ढ़लक गई तेरी काया पर जोश तुम्हारा मेरुदंडिका वही रही  तुम टूटी बिखरी सिमटी और समेटा उफ्फ न किया  तुम...

नाराज़गी बेवफ़ाई

नाराज़गी, बेवफ़ाई, अश्लीलता,  तुम्होर गहने नहीं तुम तुम्हीं हो तुम्हारा गहना. ऐसे ख्यालों में आती है। जैसे किसी विराने में गहराता अन्धकार  और सहसा किसी का खिलखिला कर हँसना दूर तक फिर बिखर सन्नाटा  आस पास फिर किसी का अहसास जैसे सहरा में उभरती भागती  रेत को चिलमनों में धंसता जिस्म  भाग कर झाँकने उस्पार करीब आता वो आसमान को छूता बवडर साँथ-साँय  नही खालो पालो हथेलियाँ दूर से आती कोई अलाप गुज़रते वक़्त की बारात शाम के धुंधलके में सुलगते अरमान  ऊंची उठती चिंगारी  दूर जाती आसमान में

माता पुत्र का संवाद

माता पुत्र का संवाद (अवधी भाषा में एक कविता) माता तेनी पापा पूछिन चलो अम्मा तुमका और कउनो अब नये शहर मां घुमाये लाई माता बोली चुप्पे बैइठो बहुत घुमाऐव होइगा बच्चा  मोही बुढ़िया का कैता घुमहियो सब जगह तो बच्चा  वई कारी कारी सड़कै हैं  वई नदियां और वई तलाव  वई मोटरै और वई मनई वई मेहरियां  वई मन्दिर वई इमारतें वहै आसुमान वई चिरैया, चमगादड़  का कोई चीन्हें मिलत है, कैता देखी वई टिरेने वई पटरी का जालु सब कैईती  वई बसै, वई तांगा, एक्का हैं बच्चा  वहै जबान चाहे जउन खवाओ  यही जीभु का जिव नहीं भरत है  भले पेटु भर जाय,  जिव का पकरे क परत है। भइया तुम अपने काम करो दुई पईसा जोआरो कामै अहिहैं। आगे काम परे हैं ढेरन। पापा फिर चुप्पाये रहे,  हंसी कै माता की बातन की थाह  पकरि लिहिन और बिचार फिर करै लागि फिर किस्सा होयी गयी माता हमरी तरुण कुमार शुक्ल  बनारस रात्रि ११:३३ (माता =अजिया, जिव=मन

रूदाद

अपनी रूदाद ज़माने को सुनाते क्यों हो  ग़ैर के सामने औकात गिराते क्यों हो ग़म उठने का अगर ताब नहीं है तुममें  अपनी पलकों पर हंसी ख्वाब सजाते क्यों हो ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं टूटेंगे तो बिखर जायेंगे  रेत के ढेर पर दीवार उठाते क्यों हो।  तरुण कुमार शुक्ल 

आज तुम्हारी याद

आज तेरी याद आई तो आती चली गई  पलकों पर सदियों की चादर सी तन गई पल-पल ठहर कर मोना कुछ यूँ कह गया  कभी आओ हमारे आँगन में छेडेंगे तार बचपन के  गुनगुनायेंगे कोई गीत जवानी की बागबाँ का  रह जायेगा कोई एक चेहरा-तुम्हारा  यादों की कोठरी में कोई- तुम्हारा अपना  यादों के वास्ते हो मुझको ही अपना कहलो  हम कब हुये हैं किसके ऐसा चलन रहा है  यादों में रह गये है नासूर से हैं गहरे  हमको कोई क्यों संभाले याद उफ़ ये यादें तरुण कुमार शुक्ल 

वो पूछती हैं हाल मेरा

नींद खुल गई है   *वो मुझसे पूछती है*  हर बार पूछती है  तुम्हारे साथ कौन है मैं कहता हूं बहुत कुछ है दवाएं हैं, गोलियां हैं  मिक्सचर है  नहीं और कौन है तुम्हारे साथ  कोई है  मैं कहता  दिल है, धड़कने हैं  ऐसा लगता है सांसे  भी इधर उधर  चलती फिरती उठती बैठती  अपनी मौजूदगी  रजिस्टर में दर्ज़ करती हैं  तुम्हारा ख़्याल रखने वाला  कोई है  मैं कहता हूं  हां यादें हैं  तन्हाई है  मौसम की रुसवाई है  बीते मौसमों की खुशबुएं हैं  हैं तो साथ सभी का  बस तुम सामने बैठी  निहारा करती हो आती .... बस पूछती रहती है तुम्हारे पास कौन है ? इंतजार है  अरसों की जुदाई है फेहरिस्त में लंबी सी अधूरी पड़ी  कुछ ख्वाहिशें हैं  लंबी दूरी तय करने  वाले हमसफर की  तलाश है एक सफर लंबा  वीरान है तरुणकुमारशुक्ल मुंबई  ८ फरवरी २०२६  प्रातः २:२८ मिनट 

मज़दूर दिवस

मज़दूर दिवस  रात अँधेरी शीत बयार दिन का मेहनत कस इंसान दुनिया से बिंदास दिन के सपने रात के सपने कैसे मिलते होंगे कैसा बचपन कैसी जवानी कैसा है इन बूढों का बुढ़ापा कई दर्द कई तकलीफे होंगी कैसे सोते हैं ये खुलकर, नहीं छुपा  है इनका जीवन खुले गगन में चाँद के नीचे दिन की तपन को भूलके कैसे मस्त पड़ें कैसा होगा  जो इनके सपनों सौदा करता होगा क्या होगा कैसा होगा इनके हिस्से का सपना  शायद करतें हो ये दुआ अबके सावन में इतना पानी न बरसे अबकी गर्मी में इतनी लू न चले होगा इनका भी सपना आओ हमभी दुआ करें इनकी भी अपनी  छत हो जहां बसे इनका भी घर चार दीवारें इनकी हो इक दरवाज़ा हो स्वागत का जहां  खड़े हो इनकी गृहणी इनके बच्चे हाँथ में   इनके थैला हो थैले में थोड़े ही चाहे पर सुन्दर से सपने हों सुबह का सूरज इनके द्वारे दस्तक दे आओ हम भी  दुआ करें इनका भी अपना जीवन हो आँखों में अच्छे  सपने हों तरुण कुमार M...