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नाराज़गी बेवफ़ाई

नाराज़गी, बेवफ़ाई, अश्लीलता,  तुम्होर गहने नहीं तुम तुम्हीं हो तुम्हारा गहना. ऐसे ख्यालों में आती है। जैसे किसी विराने में गहराता अन्धकार  और सहसा किसी का खिलखिला कर हँसना दूर तक फिर बिखर सन्नाटा  आस पास फिर किसी का अहसास जैसे सहरा में उभरती भागती  रेत को चिलमनों में धंसता जिस्म  भाग कर झाँकने उस्पार करीब आता वो आसमान को छूता बवडर साँथ-साँय  नही खालो पालो हथेलियाँ दूर से आती कोई अलाप गुज़रते वक़्त की बारात शाम के धुंधलके में सुलगते अरमान  ऊंची उठती चिंगारी  दूर जाती आसमान में

माता पुत्र का संवाद

माता पुत्र का संवाद (अवधी भाषा में एक कविता) माता तेनी पापा पूछिन चलो अम्मा तुमका और कउनो अब नये शहर मां घुमाये लाई माता बोली चुप्पे बैइठो बहुत घुमाऐव होइगा बच्चा  मोही बुढ़िया का कैता घुमहियो सब जगह तो बच्चा  वई कारी कारी सड़कै हैं  वई नदियां और वई तलाव  वई मोटरै और वई मनई वई मेहरियां  वई मन्दिर वई इमारतें वहै आसुमान वई चिरैया, चमगादड़  का कोई चीन्हें मिलत है, कैता देखी वई टिरेने वई पटरी का जालु सब कैईती  वई बसै, वई तांगा, एक्का हैं बच्चा  वहै जबान चाहे जउन खवाओ  यही जीभु का जिव नहीं भरत है  भले पेटु भर जाय,  जिव का पकरे क परत है। भइया तुम अपने काम करो दुई पईसा जोआरो कामै अहिहैं। आगे काम परे हैं ढेरन। पापा फिर चुप्पाये रहे,  हंसी कै माता की बातन की थाह  पकरि लिहिन और बिचार फिर करै लागि फिर किस्सा होयी गयी माता हमरी तरुण कुमार शुक्ल  बनारस रात्रि ११:३३ (माता =अजिया, जिव=मन

रूदाद

अपनी रूदाद ज़माने को सुनाते क्यों हो  ग़ैर के सामने औकात गिराते क्यों हो ग़म उठने का अगर ताब नहीं है तुममें  अपनी पलकों पर हंसी ख्वाब सजाते क्यों हो ख़्वाब फिर ख़्वाब हैं टूटेंगे तो बिखर जायेंगे  रेत के ढेर पर दीवार उठाते क्यों हो।  तरुण कुमार शुक्ल 

आज तुम्हारी याद

आज तेरी याद आई तो आती चली गई  पलकों पर सदियों की चादर सी तन गई पल-पल ठहर कर मोना कुछ यूँ कह गया  कभी आओ हमारे आँगन में छेडेंगे तार बचपन के  गुनगुनायेंगे कोई गीत जवानी की बागबाँ का  रह जायेगा कोई एक चेहरा-तुम्हारा  यादों की कोठरी में कोई- तुम्हारा अपना  यादों के वास्ते हो मुझको ही अपना कहलो  हम कब हुये हैं किसके ऐसा चलन रहा है  यादों में रह गये है नासूर से हैं गहरे  हमको कोई क्यों संभाले याद उफ़ ये यादें तरुण कुमार शुक्ल 

वो पूछती हैं हाल मेरा

नींद खुल गई है   *वो मुझसे पूछती है*  हर बार पूछती है  तुम्हारे साथ कौन है मैं कहता हूं बहुत कुछ है दवाएं हैं, गोलियां हैं  मिक्सचर है  नहीं और कौन है तुम्हारे साथ  कोई है  मैं कहता  दिल है, धड़कने हैं  ऐसा लगता है सांसे  भी इधर उधर  चलती फिरती उठती बैठती  अपनी मौजूदगी  रजिस्टर में दर्ज़ करती हैं  तुम्हारा ख़्याल रखने वाला  कोई है  मैं कहता हूं  हां यादें हैं  तन्हाई है  मौसम की रुसवाई है  बीते मौसमों की खुशबुएं हैं  हैं तो साथ सभी का  बस तुम सामने बैठी  निहारा करती हो आती .... बस पूछती रहती है तुम्हारे पास कौन है ? इंतजार है  अरसों की जुदाई है फेहरिस्त में लंबी सी अधूरी पड़ी  कुछ ख्वाहिशें हैं  लंबी दूरी तय करने  वाले हमसफर की  तलाश है एक सफर लंबा  वीरान है तरुणकुमारशुक्ल मुंबई  ८ फरवरी २०२६  प्रातः २:२८ मिनट