कुछ की तलाश

मंज़िल तलाशते रहे 
मंज़िल की खेरों ख़बर 
न मिली 
मुझे मेरे इश्क ने डुबोया 
किसी और की क्या बात करें
तुम न होते तो 
कोई और होता तो 
क्या कुछ में 
कुछ ढूंढता है 
कोई 
मुक्कमल सा 
क्या कुछ 
मिलता भी तो 
मंज़िल समझ कर 
रुक जाते 
या सांस थमने 
तक मुक्कमल 
मंज़िल की तलाश रहती 

 *तरुण कुमार* 
*लखनऊ* 
*४ दिसम्बर २०२५*
*१०:११ सुबह*

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