फैज़ तुम्हारी अज़मत

ज़िंदगी इसी रौब का नाम है फैज़ 
तुमको देखो तो तुम्हारी आंखों में 
धधकते हैं इल्म से लबरेज़ शोले 
तुम चलो तो छलक पड़ते हैं 
कदम ब कदम इंकलाब के नारे 
राहों में जैसे उठते है शोलों के अंबार 
तेरी आवाज़ पे उठ के चल पड़ते हैं 
जवान बूढे औरतें अपने घरों से
हम क्रांति को तो नहीं जानते हैं 
उत्पीड़न को जानता हूं, 
भूख को शिद्दत से महसूस किया है 
जंगली शेर को शिकार करते तो नहीं देखा
हां 
हवस से भरी आंखों को चीखते टूटते 
जिस्म को नोचते देखा है
बारहा बार देखा है 
प्रकृति के नियमों में तो यूं ही पल गया
मगर इंसानी उसूलों को कुचलते 
इंसानों को खूब देखा है
चलो आओ मेरे साथ 
हर गली हर मोहल्ले में 
इंसानों के ईमानों की दुकानें हर तरफ 
नीलामी पर चढ़ी हैं
तुम क्या खरीदोगे क्या बेचोगे 
ख़ुद का गिरेबां कौन सा पाक है पागल
इस भरे बाज़ार में तुम बिल्कुल भी तन्हा 
इक पल नहीं पाओगे

कुछ इश्क किया कुछ काम किया 
फिर आख़िर तुमने अज़ीज़ आकर 
न इश्क किया न काम किया 
दोनों को ही छोड़ दिया 
ये भी क्या कोई कम फ़ौलादी 
काम न था 
फैज़ तुम्हारी महफ़िल में कुछ 
साहिर भी थे कुछ जोश भी थे
तुम किसकी फ़िराक़ में गुम भी थे
कैफ़ी मजाज़ भी झूमा करते थे 
इक़बाल तुम्हारा बुलन्द भी था 
फैज़ तुम्हारी महफ़िल में नौजवानों 
के लिए तकरीरें भी थी इल्म के जादूगर 
भी थे कुछ मस्ती कुछ हस्ती थी 
सब याद तुम्हें तो करते हैं।

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