एक जश्न तेरे ही नाम

एक जश्न तेरे नाम 

मौत तो न जाने कब हो चुकी थी ,
लोग जश्न न जाने कब मनाएंगे। 
इंसान ज़िंदगी में एक नहीं कई बार मरता है,
तुम सिर्फ जिस्म की मौत को ही मरना कहते हो  

जिस्म से जान के निकलने का मातम मना रहे हो
तुम मेरे अपने नहीं क्या कोई दुश्मन हो क्या ? 
खुश हो कि एक और ज़िंदगी आज़ाद हो गयी 
कुछ और जीते रहते तो क्या होता मेरे यार 
यही हश्र होता, चल मुस्कुरा भी दे फिर मिले न मिले

इसके गुमान में मत रहना 
आज तक किसी को मौत के बाद 
मिलते देखा है क्या तुमने 
ये इस दुनिया के गढ़े फ़साने हैं 

ये जीते जी के तमाशे हैं 
ये कहते तो हैं मगर मानते तो कुछ भी नहीं 
बस उसके खौफ में जीते हैं 
और यहां की ज़िंदगी से तंग आकर 
कंही दूसरे जहान की खूबसूरती के ख्वाबों में डूब कर 
अपनी गरीबी को झूठे ही मुँह चिढ़ा कर खुश होते हैं 

बहकने का भी मज़ा है यारों 
लेकिन झूठी तस्सली में जीना बे मज़ा है यारों 
गले लग जाओ सब छोड़ कर इक  बार
बड़ा सुकूं है 
जैसे पहले भी हर मौत से गुज़र कर जिये हो जीवन
वैसे ही बस मौत का जश्न मना लो यारों। 

तरुण कुमार     

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