एक नयी सुबह्


एक नयी सुबह 

एक नयी सुबह्
भी कैसी मतलबी  सी होती है
मैं तुम्हे कैसे भूल जाऊं भला
तुम रोज़ आओगी ?
जी मैं ?
रोज़ ही आती हूँ
तुमसे नहीं पुछा
उन यादों को टटोला मैंने
मैं कहां  जाउंगी
इन वीरां राहों में
बड़ी बीहड़ है
खो जाती हूं कंही
दुबक कर थाम लेती हूँ
कोई कोना तुम्हारे ज़हन में बस
जब ज़माने की तल्ख़ 
राहें मिलती हैं कंही
कोई दर्द कोई ख़ुशी
छलक आती हैं जब आँखें
ढलक कर आँखों से
तुम्हारी हथेलियों पर
आ तो जाती हूँ  



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