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Showing posts from April, 2025

कुछ तो लोग कहेंगे ही

वो अगर कुछ अलग है  तो सवाल करो  अगर बहुत अलग है  तो सवालों से भी परे है  तुम पर जो अपनी पूरी क़ायनात लुटा दे  उससे भी सवाल करते हो  तो तुम अपने को तौलो  उसको तो इस दायरे में मत घसीटो कैसे समझ गये तुम उसकी भाषा को  पहले ये बतालाओ  अंतर्मन में चला जो तुम्हारे  उसको तुमने गढ़ा उसका बतला कर तुम अपनी हस्ती पहचानो

बड़ी अजीब सी कश्मकश में हूं !

बड़ी अजीब सी कश्मकश में हूं। करना भी है और छुपाना भी है। तुम्ही से है तो,  पर मालूम भी नहीं,  तुम्ही कहो  इस सूरते हाल का  कोई हल हो तो कहो  अर्से से इंतज़ार तो था इस लम्हे का  अब सामने ये कश्मकश  न जाने क्यों  है तो है  क्या करूं तुम्ही कहो  करूं तो क्या करूं उंगलियों में उंगलियां उलझी तो हैं ज़बाँ पर लफ्ज़  क्यों आते नहीं लटें बिखरी  न जाने कबसे बेकरार तो हैं कोई इनको संवारे तो क्यों संवारे  चेहरे पर पसीने की बूंदे  हैं तो हैं  कोई इनको समझे तो क्यों समझे तरुण कुमार 2 नवंबर 2024

मेरे बाबा का गांव

मेरे बाबा का गांव वो मेरे बाबा का गांव  बाबा के घर में बाबा का कमरा  सामने खलिहान में मढ़नी माढ़ते  शम्भू काका  साथ में रामेसुर बड़े, मसखरी करता रजिंदे  अकसर गांव में रजिंदे का बप्पा रामऔतार  हमारे बाल बनाता था  गांव का नाम सामने आते ही  न जाने कितने नाम, चेहरे  याद आते हैं  फिर मुझे यही लगता  ये गांव मेरा ही नहीं  ये तो रजोले सढोले बचोले  विजईया और चरसी पुदुनू का गॉव है  हाँ यही सच है  क्योंकि  अब वो गॉव  गाँव नहीं  याद है  जहाँ शहर से मुख़्तलिफ़ कुछ भी नहीं है।     तरुण कुमार  २- ३- —------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ४- —--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ५ -----------------------...

वो खिड़की जो खुली

ना जाने क्यों  वो खिड़की जो खुली  तो है  पर न जाने क्यों  बंद से हालात क्यों  अर्से से तक रहा हूं  हवाओं के दौर में  मौसम का बदलना  बदस्तूर चल रहा  पर्दा तो है  सरका के दरकिनार  आहटें भी मिल रही हैं  खिड़की के पार की दीवार  साफ़-ओ-शफ़्फ़ाफ़ भी तो है रोशनी की आमद भी ख़ूब है  धड़कने भी साफ सुन रहा हूं  आंखों का उठना झुकना  मिलना मिलाना मुक्कमल है  बस लम्हों का मिलना मिलाना  तलब का तलबी में तब्दील होने  का इंतजार है  तरुण कुमार  लखनऊ  २०/०४/२०२५ १०:३०सुबह

चले भी आओ

कुछ जिंदगी झूम झूम  कहती तो है  तुम कायनात के  इशारे तो समझो  राहों में बिखरे पड़े हैं  खत तमाम हसरतों के  सुनो तो सुनो  झंकार इनकी  रंगीनियां पुकारती  चल रही  कदम ब कदम  साध कर उम्मीद  दर ब दर  चले भी आओ  और कितना इंतज़ार  बाकी है बहुत सी शाम  हथेलियों में ढलती उतरती रात सिमटने को बेताब  चले भी आओ  तरुण कुमार  लखनऊ  10:24रात्रि ०६/०४/२०२५

गांव की वो पगडंडी

गांव की वो पगडंडी  याद बहुत कुछ आता है  आते जाते राहों में  कितने प्रसंग यूं ही  खुल जाते हैं  कुछ याद है तुमको  कुछ तो याद मुझे भी है  आना तुमको किस्सों  की पोटली थमा कर हाथों में  किसी पगडंडी राह तुम्हारी देखूंगा  आना तुम  उसको भी अपने संग ले आना  राह तुम्हारी देखूंगा  वो कुआं ताल तलैया  वो चौपाल तुम्हारे द्वारे की  संगी साथी  छुपी छुपौवल  आंख मिचौली  सोलह सावन पहले  वाली जेठ की धूप  सावन की फुहारें  फिर बसंत दर बसंत  फाग की होली  भर पिचकारी जो मारी थी  भीगी थी सारी अंगिया तोरी  कुछ आने पर कुछ जाने पर सोहर बन्ना ढोलक बजी दुआरे थी क्या क्या याद दिलाऊं तुमको  आना अबकी जब इन राहों  गीत नए मैं गाऊंगा  इकतारे वाला  बैरागी गाता तुमको दिख जायेगा  ज़रा ठिठकना फिर चल देना तरुण कुमार ११:०० बजे सुबह  लखनऊ  १९/०३/२०२५

तुम जीवन से जुड़ी हुई हो

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तुम जीवन से जुडी हुई हो तुम आती हो ले जाती हो पीड़ा भय जीवन, प्रेम ये सब के सब यूँ धरे-धरे रह जाते हैं ये संगी साथी सांझ सबेरा ओर वो रात सर्दी, गर्मी, ये बरसात ये सब के सब यूँ धरे-धरे रह जाते हैं ना जाने कौन सफ़र पर जाते हैं जहाँ से लौट नहीं फिर आते हैं वो गाँव नदी वो मंदिर ठौर-ठिकाने क्यों याद तुम्हे नहीं आते हैं जीवन मृत्यु का फर्क सब जीवन में जीवित ही समझाते हैं तरुण कुमार Monday, November 19, 2007 tum aati ho le jati ho peeda bhay जीवन, prem ye sab ke sab yu dhare dhare reh jate hain Ye sanghi sathi sanjh sabera aur vo raat sardi,garmi, ye barsaat ye sab ke sab yu dhare dhare reh jate hain na jane kaun safar par jate hain janha se laut nahi phir aate hain wo gaon nadi wo mandir thaur theekane kyu yaad tumhe nahi aate hain jeevan mrityu ka farq sab jeevan may jeevit hi samjhate hain tarun

यादों को लिये

Yadon ko liye main teri kin galiyon se guzra hoon kai modon par thithka main kai jagho par thahra main kuchh Salon ka rishta tha kai sadiyon sa lamba safar unnhi thikano ne mujhko mano phir jhakjhora tha saath tumhari yaaden thi sabki sab phir bikhar gayi pehle man is anayas se ek pal ko bechain ho gaya yaden bhi sari kilak uthi phir na jane kyu seham gayi kitna sab kuch badal gaya apna sa koi reh na gaya yadon ko liye main hantho main yadon se yaden jod raha tha ye rahe safar tum kya jano yadon me yaden cheekh padi ik tumhi nahi ho rahi in galiyon ke meri tarah tanha ho tab poocho ye hale safar yaden to tumhare saath hain rahi unki socho janha na hongi yaden bhi sathi kitni kadvi hogi wo jawani yadon ke masiha yadon se ik koi aisi yaad to dedo mujhko meri yadon se koi ik meethi yaad to chundo yaden to tumhare saath hain kis khatir aab tak saath liye kin galiyon me main aa panhucha koi to hoga maqsad inka, kanhi to hoga tera bhi dar mujhko wo dar dik...

रफ़्ता रफ़्ता

  रफ़्ता - रफ़्ता  ज़िंदगी रफ़्ता -रफ़्ता  गुज़रती चली गयी  एहसास तो था मगर कभी यूँ महसूस न हुआ  क्या था जो गुज़र गया इस दौर में  वो बचपन, वो बचपन की इक-इक याद  बैठा जो ये ख्याल तो न जाने कितनी तस्वीरें यूँ पल में गुज़र गयी  तोतली,तुतलाती,गिरती पड़ती,संभालती उम्र  बारिश की पहली फुहार में भीगने  की ज़िद  मीठी-मीठी मिट्टी की सोंधी ख़ुश्बू में  पागल ये मन न जाने क्या चाहता था मगर  सब कुछ कितनाबेख़बर था, कैसा था ये बचपन भी  पल जैसे कभी ठहरते ही न थे  दिन तो बड़ी बात थी,  सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम  शाम से रात और रात से सुबह  कैसी सपनो भरी रात होती  वो संगी वो साथी कोई भेद नहीं जानता था  बस एक साथी होता था  कभी नहीं आया था वो ख्याल वो पल ज़हन में की  ख़त्म हो जायेगा ये सब यूँ ही इतनी जल्दी  या एक एक दिन  है कोई मेरे और इस पल के बीच में  जहाँ से मुड़ते हैं हम  हैं मोड़ दर मोड़ इस राह में  धुंधली-धुंधली यादें कितनी अच्छी लगती हैं  वो अबोध बचपन  वो माँ  शायद कोई...