मज़दूर दिवस
मज़दूर दिवस रात अँधेरी शीत बयार दिन का मेहनत कस इंसान दुनिया से बिंदास दिन के सपने रात के सपने कैसे मिलते होंगे कैसा बचपन कैसी जवानी कैसा है इन बूढों का बुढ़ापा कई दर्द कई तकलीफे होंगी कैसे सोते हैं ये खुलकर, नहीं छुपा है इनका जीवन खुले गगन में चाँद के नीचे दिन की तपन को भूलके कैसे मस्त पड़ें कैसा होगा जो इनके सपनों सौदा करता होगा क्या होगा कैसा होगा इनके हिस्से का सपना शायद करतें हो ये दुआ अबके सावन में इतना पानी न बरसे अबकी गर्मी में इतनी लू न चले होगा इनका भी सपना आओ हमभी दुआ करें इनकी भी अपनी छत हो जहां बसे इनका भी घर चार दीवारें इनकी हो इक दरवाज़ा हो स्वागत का जहां खड़े हो इनकी गृहणी इनके बच्चे हाँथ में इनके थैला हो थैले में थोड़े ही चाहे पर सुन्दर से सपने हों सुबह का सूरज इनके द्वारे दस्तक दे आओ हम भी दुआ करें इनका भी अपना जीवन हो आँखों में अच्छे सपने हों तरुण कुमार M...