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Showing posts from November, 2024

तुमने देर कर दी

वो तुम्हारे इंतजार में था  उसे मालूम था तुम आओगे  गिले शिकवे वो साथ ले गया  कुछ मलाल  मेरे साथ रह गया  कहनी सुननी  सब वही की  वहीं रह गई कुछ यादें  कुछ हरकतें  जो उसकी थी  सब यही यहीं की  यहीं रह गई 

वो जब याद आए

जब याद आये  सोचता हूँ  क्या कहु  कैसे कहूं की तुम  आखिर हो तो  क्या हो  रोक लू ये जी चाहता तो है  मगर तुमको न रोकू दिमाग कहता है  कितने काम हैं तुमको उनका क्या होगा  चलो जाने दो  जब चली जाओगी  तभी तो कविता में आओगी  चलो जाओ तुम  बड़े काम बाकी हैं  मुझे भी तो  ये क्या बात हुई  जब मुझे काम होते हैं  तुम अपने काम न गिनाया करो  मेरे कामों को तुम क्या जानो  कब ये ताना है या कब एहसास  मुझे तुम अपने पास खींचो तो ज़रा  मेरी साँसों को तुमने ही तो भाँपा है  सोचता हूँ इस बार जब तुम जाओगी  एक कविता लिखूंगा लम्बी सी  उसके कानो में कहूंगा कुछ अपनी सी  उसके गालों को छूवूँगा हलके से  वो तिरछी आँखों से देखेगी  कहो कुछ कहना है क्या तुमको  अभी तो आयी हूँ वहां से मैं  तुम्हे कितना समय देकर  चली गयी वो उस रात कुछ  यूँ क...

कश्मकश

बड़ी अजीब सी कश्मकश में हूं। करना भी है और छुपाना भी है। तुम्ही से है तो,  पर मालूम भी नहीं,  तुम्ही कहो  इस सूरते हाल का  कोई हल हो तो कहो  अर्से से इंतज़ार तो था इस लम्हे का  अब सामने ये कश्मकश  न जाने क्यों  है तो है  क्या करूं तुम्ही कहो  करूं तो क्या करूं उंगलियों में उंगलियां उलझी तो हैं ज़बाँ पर लफ्ज़  क्यों आते नहीं लटें बिखरी  न जाने कबसे बेकरार तो हैं कोई इनको संवारे तो क्यों संवारे  चेहरे पर पसीने की बूंदे  हैं तो हैं  कोई इनको समझे तो क्यों समझे तरुण कुमार 5 नवम्बर 2024

लम्हा लम्हा ही सरकी

 लम्हा लम्हा ही सरकी  मगर सरक ही  गयी वो ईक दबी सी आस वो वो लम्हे  सिमट कर वो भरी महफ़िल में मेरे पहलू में आकर यूँ सरक कर आ गई  सदियों पुराना  राग कोई  छेड़ गई  इक सरसराहट ने  हौले हौले  संगीत की  रंगीनियों ने  घेर कर  यूँ चूम कर पूछा उन ऋचाओं का नाम  मैंने कहा वो एक है  और चल दिया  जो साथ है  बादलों में  तारों की बारात में  उस सरकते चांद ने  धीरे से हौले से और सरकते  साथ में पूछा  तुम्हें कुछ याद है  तरुण कुमार 02-11-2024 लखनऊ  08:44 AM