बड़ी अजीब सी कश्मकश में हूं। करना भी है और छुपाना भी है। तुम्ही से है तो, पर मालूम भी नहीं, तुम्ही कहो इस सूरते हाल का कोई हल हो तो कहो अर्से से इंतज़ार तो था इस लम्हे का अब सामने ये कश्मकश न जाने क्यों है तो है क्या करूं तुम्ही कहो करूं तो क्या करूं उंगलियों में उंगलियां उलझी तो हैं ज़बाँ पर लफ्ज़ क्यों आते नहीं लटें बिखरी न जाने कबसे बेकरार तो हैं कोई इनको संवारे तो क्यों संवारे चेहरे पर पसीने की बूंदे हैं तो हैं कोई इनको समझे तो क्यों समझे तरुण कुमार 5 नवम्बर 2024