वो निकल गयी
रफ़्ता - रफ़्ता ज़िंदगी रफ़्ता -रफ़्ता गुज़रती चली गयी एहसास तो था मगर कभी यूँ महसूस न हुआ क्या था जो गुज़र गया इस दौर में वो बचपन, वो बचपन की इक-इक याद बैठा जो ये ख्याल तो न जाने कितनी तस्वीरें यूँ पल में गुज़र गयी तोतली,तुतलाती,गिरती पड़ती,संभालती उम्र बारिश की पहली फुहार में भीगने की ज़िद मीठी-मीठी मिट्टी की सोंधी ख़ुश्बू में पागल ये मन न जाने क्या चाहता था मगर सब कुछ कितनाबेख़बर था, कैसा था ये बचपन भी पल जैसे कभी ठहरते ही न थे दिन तो बड़ी बात थी, सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम शाम से रात और रात से सुबह कैसी सपनो भरी रात होती वो संगी वो साथी कोई भेद नहीं जानता था बस एक साथी होता था कभी नहीं आया था वो ख्याल वो पल ज़हन में की ख़त्म हो जायेगा ये सब यूँ ही इतनी जल्दी या एक एक दिन है कोई मेरे और इस पल के बीच में जहाँ से मुड़ते हैं हम हैं मोड़ दर मोड़ इस राह में धुंधली-धुंधली यादें कितनी अच्छी लगती हैं वो अबोध बचपन वो माँ शायद कोई...